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सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   31-03-2018
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कांग्रेस के गुजरात मंथन के जो कुछ निकला है वो अपना असर दिखाने लगा है. गुजरात हालिया राजनीति की प्रयोगशाला और उत्तर प्रदेश उसे दिल्ली पहुंचाने वाला एक्सप्रेस वे है, इस धारणा की तस्वीर भी अब धुंधली नहीं रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई मामलों में उनकी कॉपी करते दिख रहे राहुल गांधी दोनों ही ऐसी धारणा में यकीन रखते हैं.

कांग्रेस संगठन में जो ताजा फेरबदल हुआ है वो बता रहा है कि गुजरात की प्रयोगशाला से निकले नेताओं का अब टीम राहुल में बोलबाला रहेगा. साथ ही, राहुल गांधी कांग्रेस को उस दलदल से निकालने की कोशिश करते लग रहे हैं जिससे वो खुद कई बरसों से जूझ रहे हैं - अंदरूनी गुटबाजी. गुटबाजी की अब गुंजाइश नहीं रहने दी जाएगी, फेरबदल के जरिये ये इशारा जरूर किया गया है - मगर, लग तो ऐसा ही रहा है कि दूसरी जेनरेशन में शिफ्ट होने की शर्त सिर्फ युवा होना नहीं, बल्कि राहुल गांधी की कार्यशैली का डेडीकेटेड फॉलोवर होना ज्यादा जरूरी है.

कांग्रेस में द्विवेदी युग का अंत

हिंदी साहित्य की ही तरह कांग्रेस में भी एक द्विवेदी युग रहा - और जिस शख्स के नाम से ये बाद में जाना जाएगा उसी की दस्तखत से उसकी समाप्ति भी हो गयी. खुद जनार्दन द्विवेदी की दस्तखत से जारी पत्र के जरिये मीडिया को बताया गया कि उनकी जगह अब अशोक गहलोत के हस्ताक्षर मान्य होंगे. बतौर महासचिव ये द्विवेदी की आखिरी दस्तखत रही और कांग्रेस के द्विवेदी युग के अंत की औपचारिक घोषणा भी.

janardan dwivediद्विवेदी युग का अंत!

जनार्दन द्विवेदी, सोनिया गांधी के भरोसेमंद जरूर थे, लेकिन राहुल गांधी को पसंद आने वालों में कभी शुमार नहीं हो पाये. द्विवेदी के बेबाक विचार, कुछ विवादित बोल और कई मुद्दों पर स्टैंड राहुल गांधी को कभी रास नहीं आया. कुछ अपवाद तो हर मामले में होते हैं.

बाकी बातें भूल भी जायें तो प्रियंका गांधी को लेकर जनार्दन द्विवेदी का बयान शायद ही कभी कोई भूल पाये. सोनिया गांधी, प्रियंका वाड्रा और राहुल सभी अपने अपने हिसाब से याद जरूर रखेंगे. सुनने वालों को भी द्विवेदी के बयान में खास दिलचस्पी रही, खासकर प्रियंका और राहुल में तुलना करने के मामले में.

एक बार तो जनार्दन द्विवेदी ने ये कहकर हर किसी को चौंका ही दिया कि 'राजीव गांधी ने उनसे 1990 में कहा था कि राजनीति में प्रियंका की ज्यादा दिलचस्पी दिखती है. द्विवेदी का ये बयान उस दौर में आया था जब राहुल गांधी की राजनीति में दिलचस्पी न होने की बातें हुआ करती रहीं. द्विवेदी के इस बयान के बाद प्रियंका के राजनीति में आने और यहां तक कि कांग्रेस का चेहरा बनने तक कि चर्चा होने लगी थी.

राहुल के करीबियों के हवाले से आई आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक द्विवेदी की बहुत पहले ही छुट्टी होने वाली थी लेकिन सोनिया के हस्तक्षेप से मामला टलता रहा. हालांकि, कुछ दिन पहले खुद द्विवेदी ने ही संगठन में बदलाव के लिए पद से हटने का प्रस्ताव रख दिया था.

इंदिरा गांधी के जमाने में छात्र राजनीति से कांग्रेस में आये जनार्दन द्विवेदी की ट्यूनिंग राजीव गांधी से भी अच्छी रही और सोनिया के जमाने में तो कहने ही क्या. चूंकि राहुल गांधी ने खुद ही कहा है कि युवाओं को जगह देनी होगी लेकिन बुजुर्गों की भी अहमियत कम नहीं होने दी जाएगी, इसलिए उम्मीद की जाती है कि जनार्दन द्विवेदी जल्द ही किसी नये रोल में नजर जरूर आएंगे.

सचिन ही नहीं सिंधिया को भी ग्रीन कॉरिडोर

अशोक गहलोत को ऐसी जिम्मेदारी देने का मतलब तो यही है कि उन्हें मान लेना होगा कि वो जयपुर से दिल्ली स्थाई तौर पर शिफ्ट हो चुके हैं. अब वो राजस्थान में कांग्रेस के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के दावेदार नहीं रहे.

rahul, gehlotसचिन और सिंधिया जैसे नेताओं का रास्ता खुला

अशोक गहलोत को गुजरात में काम करने का इनाम भी दिया गया है, वो चाहें तो इसे ऐसे भी समझ सकते हैं. गुजरात चुनाव में राहुल गांधी के अगल बगल जो दो सीनियर नेता हुआ करते थे उनमें एक थे अशोक गहलोत और दूसरे अहमद पटेल.

अशोक गहलोत के दिल्ली तैनात हो जाने से जयपुर में सचिन पायलट के लिए आगे का रास्ता पूरी तरह खाली हो गया है. वैसे भी हाल के उपचुनावों में कांग्रेस को जीत दिलाकर सचिन पायलट हीरो तो बन ही गये हैं. गुजरात चुनाव में भी सचिन पायलट मुस्तैदी से राहुल गांधी के साथ जुटे हुए थे. वैसे भी टीम राहुल के खास लोगों में वो अरसे से मजबूती से जमे हुए हैं.

सचिन पायलट को मिले इस मौके से ये भी समझा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए भी ग्रीन कॉरिडोर बन चुका है.

दिग्विजय सिंह तो पहले ही वानप्रस्थ की ओर बढ़ चुके हैं, अब कमलनाथ की मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी भी कमजोर लगती है. वैसे मुंगावली और कोलारस उपचुनावों में शिवराज सिंह चौहान को शिकस्त देने के बाद कमलनाथ ने खुद ही कह दिया था कि सिंधिया को सीएम उम्मीदवार बनाया जाना चाहिये. वैसे इन बातों का सियासी मतलब तो कोई होता नहीं. नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के बारे में लालू की राय पूछे जाने पर जवाब मिलता था - कोई शक है क्या? और कुछ ही देर बाद रघुवंश प्रसाद सिंह नीतीश कुमार पर बरसने लगते थे.

साइड इफेक्ट नहीं सीधा असर

कांग्रेस में हुए इस बदलाव के कुछ साइड इफेक्ट भी दिख सकते हैं और कुछ मामलों सीधा असर भी देखने को मिल सकता है. अशोक गहलोत को नयी टीम में अहम जगह मिलने के बाद अहमद पटेल खुद की एक सीट भी पक्की मान सकते हैं - वैसे भी गुजरात में बीजेपी के जबड़े से जीत छीन कर अमित शाह को राज्य सभा चुनाव में शिकस्त देना कोई मामूली बात नहीं थी. सोनिया के अध्यक्ष रहते कांग्रेस में सबसे पॉवरफुल माने जाने वाले अहमद पटेल राहुल राज में भी क्रीमी लेयर का हिस्सा बने रहेंगे इसमें अभी तो शक नहीं है.

कांग्रेस में सोनिया सोनिया जपते हुए मेनस्ट्रीम में बने रहने वालों के लिए संकेत ये है कि अब कोई अमरिंदर सिंह नहीं बन पाएगा. पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले राहुल के करीबी प्रताप सिंह बाजवा को अमरिंदर के दबाव में हटाने को मजबूर होना पड़ा था. बाद में अमरिंदर ने कांग्रेस को जीत दिलाकर फैसले को गलत भी साबित नहीं होने दिया.

दिल्ली में शीला दीक्षित की री-एंट्री और अजय माकन को एडजस्ट करने की हिदायत के बाद मान कर चलना होगा कि हरियाणा में भी ऐसा ही कुछ होगा और बिहार को भी जल्द ही पक्का कमांडर मिलेगा.

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