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सियासत

 |  4-मिनट में पढ़ें  |   30-03-2018
बिजय कुमार
बिजय कुमार
  @bijaykumar80
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देश में चुनावों के दौरान ऐसा माहौल बन रहा जैसे मानो राजनीतिक दलों ने विकास रूपी बालक को जन्म दे दिया हो, और कह रहे हों कि जा तू अब अपना इंतजाम खुद कर ले हमने तो अपना काम कर दिया है. तभी तो आज न महंगाई, न सड़क, न ही कृषि और न ही रोजगार के मुद्दे चुनावों में हावी दिखते हैं बल्कि इनकी जगह देवी-देवता और जातियों ने ले ली है. जो बचा-खुचा ध्यान रह गया था उसपर तो नेताओं की छवि ने कब्ज़ा जमा लिया है. कैसे, आइये नजर डालते हैं कुछ हालिया घटनाक्रमों पर.

cambridge analyticaकैम्ब्रिज एनालिटिका ने किए कई खुलासे

कैम्ब्रिज एनालिटिका की चर्चा आज देश के हर कोने में हो रही है, जो ये साफ दर्शाती है कि कैसे राजनीतिक दल और नेता अब अपने कार्यों और विचारों से नहीं बल्कि मार्केटिंग और तमाम दूसरे हथकंडो के दम पर चुनाव में उतरते हैं. इसी कंपनी के एक पूर्व कर्मी ने ये दावा किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने ब्रिटेन की इस राजनीतिक परामर्श देने वाली कंपनी की सेवाएं साल 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में ली थीं, साथ ही इसी कंपनी से जुड़ी इकाइयों का सहारा साल 2009 में लोकसभा चुनावों के दौरान कई राजनेताओं और उम्मीदवारों ने भी लिया था.

इसके अलावा एक और खुलासा किया गया है. उत्तर प्रदेश में 2012 में जातिवार जनगणना कर किसी पार्टी ने यह समझने की कोशिश की थी कि आखिर उसके पास कितने कोर वोटर हैं. इन खुलासों में कितनी सच्चाई है ये तो जांच का विषय है लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि आज के दौर में ये कोई बड़ी बात नहीं है और ये सच है कि हर कोई जीतना चाहता है फिरभी किन मूल्यों पर ये जरूर सोचने वाली बात है.

बात करें कर्नाटक में आगामी विधान सभा चुनाव की तो इसके लिए तारीखों का एलान हो चुका है और राज्य में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है. लेकिन ऐसा कहा जा रहा कि कांग्रेस ने इससे पहले ही एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक जड़ दिया है जिससे विरोधियों कि चिंता बढ़ गयी है. ये मास्टरस्ट्रोक है कर्नाटक की करीब 17 फीसदी आबादी वाले लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देना. ऐसा कर कांग्रेस को लग रहा है कि वो चुनावों में इसका फायदा ले सकेगी, जिसकी उम्मीदों को बल दे रहा है बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विपक्ष के अन्य नेताओं द्वारा इस समुदाय के मठों का दौरा.

lingayat math, amit shahलिंगायत मठ में अमित शाह

बता दें कि 224 सदस्यों वाले कर्नाटक विधानसभा की लगभग 100 सीटें ऐसी हैं, जहां इस समुदाय के लोगों का प्रभाव है. दूसरी ओर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी आजकल मंदिरों और मठों के दौरे कर रहे हैं. वैसे कह सकते हैं कि उनके द्वारा इस तरह के दर्शनों का सिलसिला गुजरात चुनाव के बाद भी जारी है. उनकी पार्टी को ऐसा लगता है कि वो ऐसा कर बीजेपी को मात देने में सफल होंगे.

ऐसा नहीं है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने केवल लिंगायत वाले कदम से ही बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी की हों बल्कि कन्नड़ अस्मिता को लेकर भी एक ऐसी चाल चली हैं जिसकी काट ढूंढ़ने में बीजेपी लगी है. उन्होंने राज्य के लिए अलग झंडे की मांग कर बीजेपी के राष्ट्रवाद के मुकाबले स्थानीय अस्मिता को मैदान में उतार दिया है. जबकि प्रदेश के किसानों की हालत पर ज्यादा बात नहीं होती, जो आए दिन खुदकुशी करने के लिए मजबूर होते हैं. यही नहीं प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री की सरकार को बीजेपी भ्रष्टाचारी सरकार बताती है और खुद बी एस येदुरप्पा जैसे ऐसे नेता को अपनी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करती है जो खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में सत्ता गंवा बैठे थे.

बता दें कि बी एस येदुरप्पा भी लिंगायत समुदाय से हैं और ऐसा माना जाता है कि बीजेपी का प्रभाव इस समुदाय पर रहा है. राज्य में वोक्कालिगा समुदाय का भी राजनीतिक वर्चस्व रहा है और एचडी डेवगौड़ा इस समुदाय से हैं. वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कुरबा जाति के हैं जो ओबीसी के अंतर्गत आती है और प्रदेश में बड़ी संख्या में है. कह सकते हैं कि धर्म और जाति ये वो दो मुद्दे हैं जो फिलहाल प्रदेश के चुनाव में केंद्र बन गए हैं और रोजमर्रा की जरूरतें और विकास पिछली सीट पर बैठे मानो अपनी बारी के इंतजार में हैं, और लगता है कि उन्हें ये दिलासा दी जा रही हो कि तुम्हें भी मौका मिलेगा.

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बिजय कुमार बिजय कुमार @bijaykumar80

लेखक आजतक में एसोसिएट प्रोड्यूसर हैं

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