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सियासत

 |  5-मिनट में पढ़ें  |   18-12-2017
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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गुजरात चुनाव, सारे कयास और चुनावी घमासान... ये सब इतिहास बन गया. अगले कुछ सालों तक न यहां राहुल गांधी ही दिखेंगे और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही यहां अपने दर्शन देंगे. चुनाव बाद अगर कुछ यहां रहेगा तो वो होगा वो मुद्दा जिसकी बदौलत पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी. गुजरात चुनाव के परिणाम देखकर साफ पता चल रहा है कि गुजरात में हार्दिक के लिए हकीकत फसाना और फसाना हकीकत बनने वाला है. देखा जा रहा है कि उन स्थानों पर भी बीजेपी ही बढ़त बना रही है जहां हार्दिक का वर्चस्व माना जा रहा था.

बीतें कुछ महीनों से गुजरात के पाटीदारों को संगठित करते हुए एक मंच प्रदान करने वाले हार्दिक पटेल इन दिनों चर्चा में हैं और ये माना जा रहा है कि उनमें एक बड़ा नेता बनने के सभी गुण मौजूद हैं. हार्दिक के अब तक के राजनीतिक करियर पर अगर गौर करें तो मिलता है कि वो "अच्छा बोलते हैं." बोलने में, मुद्दे को उठाने में, आरोप लगाने में, आलोचना करने में सदा महत्त्व दिया जाता है और यक़ीनन हार्दिक इसमें अच्छे हैं.

हार्दिक पटेल, गुजरात, गुजरात चुनाव, पाटीदार    बड़ा सवाल ये भी है कि तमाम तरह के आरोपों से घिरे हार्दिक गुजरात के पाटीदारों को रिझा पाएंगे या नहीं

हार्दिक की एक खासियत और है जो उन्हें गुजरात के अन्य नेताओं से अलग करती है. हार्दिक मौकों का लाभ लेना और मुद्दों को भुनाना बखूबी जानते हैं. इस बात को समझने के लिए उनकी राहुल गांधी से मुलाकात सबसे बेहतर उदाहरण है. बताया जा रहा है कि चुनाव बाद हार्दिक सक्रिय रूप से कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं और अपने आलोचकों का मुंह बंद कर सकते हैं.

वैसे तो हार्दिक पाटीदारों के बीच खासे लोकप्रिय हैं मगर बात जब चुनाव की हो रही है तो चुनावों के मद्देनजर उनका प्रभाव कम दिख रहा है. जी हां बिल्कुल सही सुन रहे हैं आप. एग्जिट पोल्स के नतीजों पर नजर डालें तो मिल रहा है कि गुजरात के जिन स्थानों पर हार्दिक अपना प्रभुत्व रखते हैं वहां का वोटर भाजपा को अपनी पसंद बता रहा है. गुजरात की राजनीति पर नजर जमाए राजनीतिक विश्लेषकों की बातों पर अगर यकीन किया जाए तो मिल रहा है कि पाटीदार समुदाय में से एक बड़ा वर्ग ये मान चुका है कि हार्दिक मौकापरस्त हैं और अपने फायदे के लिए वो कभी भी कहीं भी आ जा सकते हैं.

गौरतलब है कि जिन पाटीदारों के आरक्षण की वकालत कर आज हार्दिक अपनी राजनीती चमका रहे हैं आरक्षण की वो मांग 2008 में तब उठी थी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. मोदी ने एक कुशल राजनेता का परिचय देते हुए तब पाटीदारों से बात की और उस आग को वहीं बुझा दिया. इसके बाद पाटीदार समुदाय ने दोबारा तब अपने आरक्षण की मांग उठाई जब आनंदी बेन पटेल ने सरकार बनाई. बताया जाता है कि तब पाटीदारों को लगा कि मुख्यमंत्री उनकी बिरादरी की हैं तो ज़रूर उनकी बातें सुनी जाएंगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हार्दिक ने पाटीदारों के उस घाव पर हथौड़ा मारा है जो उनको लम्बे समय से दर्द दे रहा था.

गुजरात में पाटीदारों की अब तक की स्थिति को देखकर ये कहना बिल्कुल भी गलत न होगा कि चाहे भाजपा हो या कांग्रेस सभी दलों ने इन्हें भ्रम की स्थिति में रखा इनसे फायदा उठाया और इनके लिए कुछ विशेष नहीं किया. ज्ञात हो कि गुजरात में पाटीदार इस लिए भी खासा वर्चस्व रखते हैं क्योंकिये एक या दो सीटें नहीं बल्कि राज्य की 70 सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं.

आपको बताते चलें कि सौराष्ट्र, दक्षिण गुजरात और उत्तर गुजरात पाटीदारो का गढ़ है लेकिन हार्दिक पटेल को उत्तर गुजरात के उसी गढ़ यानी मेहसाना और पाटन के अंदर जाने पर कोर्ट ने पाबंदी लगायी है. यही वजह है कि हार्दिक पटेल ने प्रमुख तौर पर सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और यहीं से पाटीदारों को एक करने की कोशिश की.  हार्दिक को लेकर राजनीतिक पंडित दो धड़ों में बंट चुके हैं. एक धड़ मानता है कि हार्दिक के कारण भाजपा को बड़ा नुक्सान होगा तो वहीं दूसरा धड़ ये मान चुका है कि यदि हार्दिक कांग्रेस का दामन न थामते तो नतीजे कुछ और होते. लेकिन हकीकत यह है कि हार्दिक के गढ़ मेहसाणा में बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज की है.

गुजरात में बीजेपी की सरकार बन रही है. ऐसे में ये देखना दिलचस्प रहेगा कि इन परिणामों के बाद, अब तक कई विवादों और आरोपों में घिरे हार्दिक गुजरात की राजनीति में किस भूमिका में नजर आते हैं और वो किस तरह इसे प्रभावित करते हैं. साथ ही ये देखना भी खासा मजेदार रहेगा कि अब तक जिन पाटीदारों के लिए हार्दिक आंदोलन कर रहे हैं इस चुनाव के बाद उन पाटीदारों की स्थिति क्या और कैसी होगी.

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बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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