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Updated: 22 फरवरी, 2021 02:37 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) का कहना है कि किसान आंदोलन अक्टूबर तक चलेगा, लेकिन उनके इस दावे पर अब संशय के बादल भी छाये हुए नजर आने लगे हैं. दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन में शामिल किसानों की कम होती तादाद नहीं, बल्कि आंदोलन का राजनीतिकरण ही इसकी राह में सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़ा हो गया है. ये सही है कि राजनीतिक सपोर्ट ने ही किसान आंदोलन को दोबारा खड़ा किया, लेकिन बढ़ता राजनीतिक हस्तक्षेप और किसान नेताओं के बीच गुजरते वक्त के साथ पनप रहा मतभेद ही आंदोलन पर भारी पड़ने लगा है.

राकेश टिकैत तो किसान महापंचायत बुला कर अपनी बात कह ही रहे हैं - कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भी किसान महापंचायत को संबोधित कर रही हैं, जाहिर है प्रियंका गांधी वाड्रा के लिए कांग्रेस का ही हित ऊपर होगा, बनिस्बत किसानों के. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अलग से किसान नेताओं को बुलाकर लंच कर रहे हैं - क्योंकि उनको भी पंजाब चुनाव में फिर से किस्मत आजमानी है.

किसानों के आंदोलन के चलते अब तक सबसे ज्यादा फायदे में रहे पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (Capt. Amrinder Singh) भी अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) से आंदोलन का जल्दी से समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं. समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिये कि कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब के निकाय चुनाव जैसे नतीजे ही अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भी हासिल करने की कोशिश में जुट गये हैं.

दिल्ली बॉर्डर पर कम होती भीड़ को देख कर कई किसान नेता महापंचायत छोड़ कर फिर दिल्ली बॉर्डर पर धरना और प्रदर्शन पर फोकस करने के पक्ष में किसानों से अपील करने लगे हैं, लेकिन राकेश टिकैत जैसे किसान नेता का पूरा महापंचायत पर ही नजर आ रहा है, ताकि किसान आंदोलन सिर्फ दिल्ली तक ही सिमट कर न रह जाये, बल्कि पूरे देश में इसका असर हो और सरकार पर दबाव बढ़े.

किसान आंदोलन का हल किसके पास

किसान आंदोलन का नेतृत्व अब भले ही उत्तर प्रदेश के किसानों के हाथ में आ गया हो, लेकिन जिस तरह का चुनावी असर पंजाब में देखने को मिला है वैसा यूपी में देखा जाना बाकी है. पंजाब में निकाय चुनाव नतीजों से इतना तो साफ हो गया है कि आने वाले चुनावों में किसान राजनीतिक दलों के बीच अपनी मौजूदगी जोरदार तरीके से दर्ज कराने वाले हैं. यूपी में भी अप्रैल में पंचायत चुनाव होने जा रहे हैं.

पंजाब सरकार की तरफ से जारी एक बयान के जरिये ये समझाने की कोशिश की गयी कि मुख्यमंत्री तबीयत ठीक न होने के चलते नीति आयोग की बैठक में हिस्सा तो नहीं ले सके, लेकिन एक रिकॉर्डेड मैसेज के जरिये किसानों का मैसेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचा जरूर दिया है. बयान में कहा गया कि मुख्यमंत्री ने कहा कि किसान केंद्र के तीन नये कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं और उनकी मांग है कि तीनों कानून वापस लिया जाये. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तीन नये कृषि कानूनों के कारण पैदा हुए हालात के चलते पंजाब में कृषि क्षेत्र पर मंडरा रहे खतरे पर भी चिंता जतायी है. हालांकि, नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार ने ऐसे दावों को खारिज करते हुए कहा है कि बैठक में कृषि कानूनों को लेकर किसी ने भी कोई बात नहीं कही.

rakesh tikait, narendra modi, amrinder singhराजनीतिक दांवपेंचों में फंस चुके किसान आंदोलन को राकेश टिकैत अक्टूबर तक कैसे खींच कर ले जाएंगे?

पंजाब सरकार के बयान और नीति आयोग की आपत्ति को थोड़ी देर के लिए अलग रख कर देखें तो कैप्टन अमरिंदर सिंह सीधे सीधे कृषि कानूनों को वापस लिये जाने की बात तो नहीं कर रहे हैं, लेकिन ये जरूर कह रहे हैं कि ऐसे मसले राज्यों के लिए छोड़ दिये जायें - और प्रधानमंत्री जैसे भी संभव हो किसान आंदोलन का हल निकालें.

ये हल कैसे निकाला जाये, इस बारे में भी कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी तरफ से कोई राय नहीं रखते बल्कि गेंद केंद्र के पाले में डालते हुए छोड़ देते हैं कि कैसे हल ढूंढा जाये ये केंद्र को सोचना होगा.

इंडियन एक्सप्रेस को दिये एक इंटरव्यू में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि किसान आंदोलन के साइड इफेक्ट को लेकर पहले वो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिले तो लोग समझने लगे कि वो किसानों की तरफ से मिल रहे हैं, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं था.

कैप्टन अमरिंदर ने अमित शाह से मुलाकात के बाद भी किसान आंदोलन से उपजने वाले खतरे की तरफ इशारा किया था. इंटरव्यू में कैप्टन अमरिंदर का कहना है कि किसान आंदोलन का फायदा पाकिस्तान उठा सकता है और अब तो पाकिस्तान और चीन मिल कर भी भारत के खिलाफ ऐसी मुहिम चला सकते हैं. कश्मीर की तरह पंजाब को डिस्टर्ब करना भी पहले से ही पाकिस्तान के एजेंडे में रहा है - और एक बार फिर ऐसी कोशिशें चल रही हैं. मुख्यमंत्री का कहना है कि अभी तो पंजाब में कोई स्लीपर सेल नहीं है, लेकिन लोगों में गुस्से का फायदा उठाकर वो डिस्टर्ब तो कर ही सकते हैं.

चुनावी राजनीति अपनी जगह है और कैप्टन अमरिंदर सिंह की बातों से इतर भी सोचें तो प्रधानमंत्री मोदी का किसानों के साथ बातचीत का 'बस एक फोन कॉल...' भर दूर होना बोलना ही था कि किसानों के बीच सरकार के साथ बातचीत को लेकर नये सिरे से उम्मीद जग गयी. राकेश टिकैत तो बातचीत के लिए प्रधानमंत्री मोदी का फोन नंबर ही मांगने लगे.

कैप्टन अमरिंदर सिंह पहले से ही चाह रहे हैं कि किसान आंदोलन जल्दी से खत्म हो क्योंकि उनको अब अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी करनी है. असल में कैप्टन अमरिंदर सिंह जानते हैं कि पंजाब में किसान आंदोलन का जितना राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता है वो पहले ही उठा चुके हैं और अब अगर ये लंबा खिंचता है तो उनके पास भी किसानों पर एहसान जताने के लिए कुछ नहीं बचने वाला है.

लेकिन कांग्रेस नेतृत्व किसान आंदोलन पर कैप्टन अमरिंदर सिंह के राय से इत्तफाक नहीं रखता - राहुल गांधी और उनकी टीम के रवनीत बिट्टू या प्रताप सिंह बाजवा जैसे नेता तो कतई नहीं. राहुल गांधी और उनकी टीम को तात्कालिक चुनावी फायदे से तो कोई खास मतलब भी नहीं है, वे तो बस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने का एक मौका पा चुके हैं - और अब तो इस मुहिम में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भी जुट गयी हैं. प्रियंका गांधी किसान महापंचायत के माध्यम से किसानों से कनेक्ट होने की कोशिश कर रही हैं.

किसान आंदोलन राजनीतिक-ग्रहण का शिकार

लोगों की हिस्सेदारी की कमी के चलते आंदोलन कहीं उखड़ न जाये, ये सोच कर कुछ किसान नेता रणनीतिक बदलाव भी कर रहे हैं. ऐसे नेताओं का कहना है कि महापंचायत छोड़ कर किसानों को फिर से दिल्ली बॉर्डर पर डेरा डालना चाहिये. हालांकि, राकेश टिकैत जैसे नेता इसके पक्ष में नहीं हैं.

राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन की मियाद कम से कम अक्टूबर तक बतायी है. बीच बीच में बोरियत मिटाने के लिए वो कभी महापंचायत तो कभी नये तरीके से रेल रोको आंदोलन का तड़का भी लगा दे रहे हैं, लेकिन जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ रहा है भीड़ कम होती जा रही है. फिर भी राकेश टिकैत कुछ न कुछ ऐसी बातें बोल देते हैं ताकि सरकार दबाव कम होते देख कर कहीं बेफिक्र न हो जाये.

भ्रष्टाचार के खिलाफ रामलीला आंदोलन के दौरान एक बार अन्ना हजारे ने बोल दिया कि जरूरत पड़ी तो लोग गिरफ्तारी भी देंगे - और ये सुनते ही टीम अन्ना परेशान हो गयी थी.

राकेश टिकैत का ये कहना भी कि सरकार गलतफहमी में न रहे, जरूरत पड़ी तो किसान एक फसल की कुर्बानी भी दे देंगे, किसानों को मुश्किल में डालने वाला है. ये काम राकेश टिकैत जैसे कुछ किसान तो कर सकते हैं या उनके जैसे कुछ और भी किसान कर सकते हैं लेकिन सभी किसान ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि सभी इतने सक्षम नहीं हैं. यही वजह है कि आंदोलन में मतभेद भी उभरने लगा है - राकेश टिकैत का महापंचायत पर ज्यादा जोर दिखता है और दूसरे किसान नेता चाहते हैं कि महापंचायत की जगह दिल्ली बॉर्डर पर धरने पर ध्यान दिया जाये.

पहले जो टेंट खचाखच भरे रहते थे, कई जगह खाली भी दिखायी देने लगे हैं. लंगरों में लगने वाली लंबी सी लाइन भी छोटी और कई जगह तो खत्म ही हो गई है. कुछ किसान तो सुबह घर से धरना के लिए निकलते हैं और किसानों के साथ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के बाद शाम होते होते घर लौट जाते हैं. किसानों की घर से आवाजाही शुरू हो जाने के कारण धरने का सिलसिला तो नहीं टूटा है लेकिन भीड़ कम होने से गलत मैसेज जाने लगा है.

हरियाणा के किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी तो कहने लगे हैं कि पंचायतों का जो दौर शुरू हो गया उसकी पंजाब और हरियाणा में कोई जरूरत ही नहीं है. एक वीडियो संदेश में गुरनाम सिंह कहते हैं, 'सभी भाइयों से मेरा अनुरोध है कि हरियाणा और पंजाब में वे कोई महापंचायत नहीं रखें और ज्यादा ध्यान धरना पर दें... एक सिस्टम बनायें कि हर गांव से एक खास संख्या में लोग धरना स्थल पर स्थाई तौर पर रहेंगे.'

कांग्रेस की तरफ से 'जय जवान, जय किसान' अभियान के तहत किसान महापंचायतें करायी जाने लगी हैं. मुजफ्फरनगर में ऐसी ही एक किसान महापंचायत में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि जब किसान नेता राकेश टिकैत के आंसू निकले तो प्रधानमंत्री मोदी मुस्कुरा रहे थे. किसानों से मुखातिब प्रियंका गांधी वाड्रा कहती हैं, 'प्रधानमंत्री ने आपके सामने आकर हर चुनाव में ये वादा किया था कि गन्ने का भुगतान आपको दिया जाएगा - क्या ये आपको मिला? क्या आपकी आमदनी दोगुनी हुई?'

फिर प्रियंका गांधी वाड्रा प्रधानमंत्री मोदी को अहंकारी राजा जैसा बताती हैं - और ऐसी महापंचायत कृषि कानूनों के विरोध में यूपी के 27 जिलों में होने वाली है. शुरुआत सहारनपुर से हुई है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी कोई किसान आंदोलन को लेकर कोई मौका नहीं गंवाना चाहती. राकेश टिकैत की सिसकियों के बाद मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत में तो आप नेता संजय सिंह पहुंचे ही थे, आगे भी, खबर आयी है, वो किसानों के समर्थन में महापंचायन का प्लान बना रहे हैं.

राज्य सभा सांसद संजय सिंह के मुताबिक, दिल्ली में किसान नेताओं के साथ लंच के बाद अरविंद केजरीवाल 28 फरवरी को होने जा रही किसान महापंचायत को संबोधित करने वाले हैं.

पहले आंदोलन कुछ किसान नेताओं की पहल पर शुरू हुआ. बाद में किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाला और आंदोलन किसान नेताओं के हाथ से फिसल कर भीड़ के हवाले हो गया. गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में हुई हिंसा भी आंदोलन में भटकाव का एक नमूना रही. उसके लिए जिम्मेदार कौन रहा ये अलग सवाल है, लेकिन नाकामी तो किसान आंदोलन के मत्थे ही पड़ी और अब वैसे ही किसान आंदोलन पर विपक्ष की राजनीति हावी हो चुकी है - ऐसे माहौल में कैसे माना जाये कि किसान आंदोलन अक्टूबर तक टिक पाएगा भी?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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