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Updated: 10 मई, 2020 08:00 PM
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कोरोना वायरस (Coronavirus) संक्रमण भारत में कम्युनिटी ट्रांसमिशन (Community Transmission) के स्तर तक नहीं पहुंच सका है. ये अच्छी बात है और आधिकारिक तौर पर भी अभी तक यही बताया गया है. कम्युनिटी ट्रांसमिशन कोरोना वायरस संक्रमण का तीसरा स्टेज होता है जिसमें सोर्स का पता नहीं लगता. उसके पहले तक मालूम होता है अगर कोई संक्रमित व्यक्ति है तो उसके संपर्क में आये इंसान कोरोना का संक्रमण हो सकता है.

एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने जून-जुलाई में कोरोना वायरस के संक्रमण के सबसे ज्यादा होने की आशंका जतायी है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन (Dr. Harsh Vardhan) को ऐसा नहीं लगता. बहरहाल, अब ICMR देश के उन इलाकों में अध्ययन करने जा रहा है जहां स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर लग रही है. हॉटस्पॉट वाले ऐसे 75 जिलों में कम्युनिटी ट्रांसमिशन का ऐसा अध्ययन होना है.

अच्छा तो यही होगा कि आईसीएमआर जितना जल्दी संभव हो ये अध्ययन पूरा कर ले और फिर उसके हिसाब से आगे का एक्शन प्लान बने - लेकिन ये सब इतना जल्दी करना होगा कि कम्युनिटी ट्रांसमिशन की नौबत आने से पहले उससे बचाव की तैयारी के लिए भी पर्याप्त वक्त हो.

आगरा मॉडल रेड जोन में कैसे

एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया ने कोरोना वायरस का कहर जून-जुलाई में पीक यानी चरम पर होने की आशंका जतायी है. हालांकि, वो भी ये अंदाजा नहीं लगा पाये कि ये पीक टाइम कितने वक्त का होगा. एम्स निदेशक गुलेरिया की इस आशंका को लेकर आज तक के ई-एजेंडा कार्यक्रम में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन से उनकी राय पूछी गयी.

डॉक्टर हर्षवर्धन ने न तो गुलेरिया की आशंका को सिरे से खारिज किया न ही उसे एनडोर्स किया - बल्कि, ये कहा कि ऐसा नहीं होगा और कोरोना वायरस संक्रमण की स्थिति नियंत्रण में होगी. अपनी बात के पक्ष में डॉक्टर हर्षवर्धन ने जो दलील दी वो मंत्री या नेता वाली भले हो, लेकिन एक मेडिकल एक्सपर्ट वाली तो नहीं लगी. डॉक्टर हर्षवर्धन कोरोना वायरस के कम्युनिटी ट्रांसमिशन की संभावना से भी इंकार करते रहे हैं.

डॉक्टर हर्षवर्धन ने कहा - मैं आशावादी हूं. बहुत अच्छी बात है. होना भी चाहिये. निराशावादी होना अच्छी बात तो है नहीं - लेकिन आशावादी होकर हकीकत से मुंह मोड़ लेना कौन सी समझदारी की बात है. अगर ये डॉक्टर हर्षवर्धन का राजनीतिक बयान है, फिर तो किसी को कोई शिकायत होनी ही नहीं चाहिये. वैसे भी कोई डॉक्टर मरीज और उससे जुड़े लोगों से भी तो यही कहता है कि उसने अपना काम कर दिया है, बाकी काम ऊपरवाले का बचा है.

coronavirus testingकम्युनिटी ट्रांसमिशन भले न हो लेकिन बहुत दूर भी नहीं हैं

देश में कोरोना संक्रमण के शिकार लोगों की संख्या 60 हजार के करीब जरूर है, लेकिन अब भी 200 जिले ऐसे हैं जो इस महामारी से अछूते हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने जिन 75 जिलों में कम्युनिटी ट्रांसमिशन के हिसाब से अध्ययन का फैसला किया है वे रेड जोन कैटेगरी के ही हैं - दिल्ली की सभी जिलों के अलावा इनमें मुंबई, पुणे, ठाणे, अहमदाबाद और आगरा शामिल है.

इस लिस्ट में आगरा का नाम चौंकाने वाला लगता है. लॉकडाउन के दौरान ही एक वक्त ऐसा भी रहा जब कोरोना वायरस पर काबू पाने को लेकर 'आगरा मॉडल' की तारीफ होने लगी थी. स्वास्थ्य मंत्रालय की नियमित बुलेटिन में भी इस मॉडल का जिक्र आया और इसे लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की काफी तारीफ भी होने लगी थी. आगरा मॉडल भी सोशल मीडिया पर भीलवाड़ा मॉडल की तरह ट्रेंड करने लगा था. आगरा मॉडल, दरअसल, भीलवाड़ा मॉडल का राजनीतिक जवाब रहा. भीलवाड़ा राजस्थान में है जहां कांग्रेस की सरकार है और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं, जबकि आगरा यूपी में है जहां बीजेपी के योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं. जब कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भीलवाड़ा मॉडल का क्रेडिट राहुल गांधी को देने की कोशिश की तो विवाद शुरू हो गया. सबसे पहले तो भीलवाड़ा की ही एक सरपंच ने आपत्ति जतायी. असल में आपत्ति जताने वाली सरपंच का पहले एक वीडियो वायरल हो चुका था जिसमें स्प्रे मशीन लेकर वो खुद अपने गांव को सैनिटाइज कर रही थीं. उसके बाद ही बीजेपी की तरफ से आगरा मॉडल पेश किया गया - लेकिन वो भी फेल हो गया. भीलवाड़ा मॉडल भी जयपुर या राजस्थान के दूसरे शहरों में फेल ही रहा.

सवाल तो ये भी है कि ये सारे मॉडल फेल क्यों होते जा रहे हैं?

क्या ऐसे इलाकों में कोरोना संक्रमण पर काबू महज एक संयोग रहा? या एक बार स्थिति नियंत्रण में आने के बाद लापरवाही हुई और जहां से निकले थे फिर चल कर वहीं पहुंच गये. कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार की तरफ से इंटर मिनिट्रियल सेंट्रल टीम (IMCT) कुछ राज्यों में भेजी गयी थी ये पता लगाने के लिए कि लॉकडाउन ठीक से लागू हो रहा है या नहीं और कोरोना वायरस संक्रमण से निबटने में कहीं कोई चूक तो नहीं हो रही है. और कहीं तो नहीं लेकिन पश्चिम बंगाल को लेकर इस टीम की रिपोर्ट चर्चित जरूर रही. टीम ने पश्चिम बंगाल सरकार पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया जिसे ममता बनर्जी और उनके साथियों ने खारिज कर दिया.

देश में अब भी सबसे ज्यादा खराब स्थिति महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और तमिलनाडु में है. गुजरात के लिए तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया को अहमदाबाद भी भेजा था ताकि वहां कोरोना पीड़ितों का इलाज कर रहे डॉक्टरों को वो गाइड कर सकें.

अब पता चला है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने उन राज्यों में 10 टीमें तैनात करने का फैसला किया है जहां कोरोना संक्रमण ज्यादा है और नये मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं. ऐसी टीमें गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में तैनात की जा रही हैं.

इससे पहले 20 टीमें उन जिलों में भेजी जा चुकी हैं जहां कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा संक्रमण है - साथ ही, मुंबई की स्थिति को देखते हुए एक उच्च स्तरीय टीम बनायी गयी है जो राज्य सरकार की टीम को कोरोना वायरस से जंग में सपोर्ट करेगी.

समीक्षा क्यों जरूरी है

देश के विभिन्न अर्ध सैनिक बलों में कोरोना संक्रमित जवानों की संख्या 500 से ऊपर पहुंच गयी है. खबर है कि ये तब मालूम हुआ जब उनका कोरोना वायरस टेस्ट हुआ, लेकिन उससे पहले उनमें से किसी में कोरोना वायरस संक्रमण के बाद नजर आने वाले कोई भी लक्षण नहीं पाये गये थे.

जिस तरह जवानों को एहतियाती तौर पर टेस्ट कराया गया वैसे ही मुंबई के एक न्यूज नेटवर्क के स्टूडियो में काम करने वाली कैमरा टीम के लोगों को टेस्ट सेंटर भेजा गया तो पता चला उनमें से एक कोरोना पॉजिटिव है. बीबीसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि जिसे कोरोना पॉजिटिव पाया गया उसमें भी वायरस संक्रमण के कोई लक्षण नहीं थे - और पड़ताल में मालूम हुआ कि वो तो घर से भी काफी दिनों ने निकला नहीं था.

लॉकडाउन के पहले चरण में ही छत्तीसगढ़ और ओडिशा से भी ऐसे एक-एक केस पाये गये थे, जिनकी कोई ट्रेवल हिस्ट्री नहीं थी - और एक दिन अचानक बीमार पड़ने पर जांच हुई तो सीधे कोरोना पॉजिटिव पाये गये. ICMR के ही एंडवांस्ड रिसर्च इन वायरोलॉजी सेंटर के प्रमुख रह चुके डॉक्टर टी. जैकब जॉन का तो कहना है कि कम्युनिटी ट्रांसमिशन को टालना संभव ही नहीं है. देश के जाने माने वायरोलॉजिस्ट डॉक्टर जैकब जॉन का कहना है कि सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए जरूरी कदम उठाने चाहिये.

डॉक्टर जैकब जॉन भी छत्तीसगढ़ और ओडिशा की तरह कुछ पुराने उदाहरण पेश करते हैं. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को दिये एक इंटरव्यू में डॉक्टर जैकब जॉन चेन्नई के एक केस का जिक्र करते हैं. बताते हैं 18 मार्च को 20 साल का वो युवक दिल्ली से लौटा था और उसके किसी भी संक्रमित व्यक्ति से संपर्क की कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन वो कोरोना पॉजिटिव पाया गया. उसी तरह 19 मार्च को कोलकाता में 52 साल के एक व्यक्ति की कोविड-19 की वजह से मौत हो गयी - और उसके परिवारवालों के मुताबिक उसने कोई यात्रा नहीं की थी. डॉक्टर जैकब जॉन के हिसाब से ये सब कम्युनिटी ट्रांसमिशन के ही उदाहरण हैं.

अब इससे अच्छी तो कोई बात हो ही नहीं सकती कि देश में कम्युनिटी ट्रांसमिशन नौबत ही न आये, लेकिन अगर जून-जुलाई में कोरोना के प्रकोप बढ़ने की आशंका है - फिर तो आईसीएमआर को समय रहते अपना अध्ययन पूरा कर ही लेना चाहिये ताकि जरूरत के हिसाब से आगे के फैसले लिये जा सकें.

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Coronavirus, Community Transmission, Dr. Harsh Vardhan

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