होम -> सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 20 जुलाई, 2021 06:00 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
  • Total Shares

यूपी विधानसभा चुनाव 2022 (UP assembly elections 2022) के मद्देनजर सूबे में सियासी समीकरण साधने की कवायद शुरू हो चुकी है. जाति और धर्म की चुनावी बिसात पर राजनीतिक दल हर वोटबैंक (Votebank) पर डोरे डाल रहे हैं. लेकिन, राज्य में वोटों के लिहाज से लगभग 10 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ब्राह्मणों (Brahmin) पर अगर किसी पार्टी ने पूरी तरह से फोकस किया है, तो वह बसपा (BSP) है. बीते साल कुख्यात अपराधी विकास दुबे और उसके छह साथियों को एनकाउंटर में मार गिराए जाने के बाद से ही बसपा सुप्रीमो मायावती (Mayawati) ने मुखरता के साथ भाजपा को निशाने पर लिया था. इसी के साथ मायावती ने 2007 के विधानसभा चुनाव में हिट रहे अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर काम करना शुरू कर दिया था.

हाल ही में मायावती के एक बयान में ब्राह्मणों के लिए प्रेम खूब उभरकर सामने आया है. भाजपा (BJP) पर आक्रामक होते हुए मायावती ने योगी आदित्यनाथ सरकार (Yogi Adityanath) सरकार पर ब्राह्मणों के उत्पीड़न का गंभीर आरोप जड़ दिया. मायावती ने दलित वोटबैंक की तरह ही ब्राह्मण समुदाय को साधने के लिए कहा कि ब्राह्मणों के सारे हित बसपा शासन में ही सुरक्षित हैं. योगी सरकार में समाज के सभी वर्गों का उत्पीड़न हुआ है. लेकिन, ब्राह्मण समाज अपने साथ हुए उत्पीड़न से काफी दुखी है. मायावती ने कहा कि इस बार के चुनाव में ब्राह्मण गुमराह नहीं होगा और बसपा के साथ मिलकर सर्व समाज की सरकार बनाएगा.

किसी जमाने में दलित वोटबैंक पर एकछत्र पकड़ बनाए रखने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती इस तरह के बयान दिया करती थीं. किसी जमाने में दलित वोटबैंक पर एकछत्र पकड़ बनाए रखने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती इस तरह के बयान दिया करती थीं.

किसी जमाने में दलित वोटबैंक पर एकछत्र पकड़ बनाए रखने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती इस तरह के बयान दिया करती थीं. लेकिन, अब उत्तर प्रदेश में खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे ब्राह्मण समाज को साधने के लिए मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि दलितों की तरह ही ब्राह्मणों का हित भी बसपा के साथ रहने से पूरा हो सकता है. बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा इसी महीने अयोध्या से ब्राह्मण सम्मेलन की शुरुआत करेंगे और सूबे के अन्य जिलों में भी इसका आयोजन किया जाएगा. भाईचारा कमेटियों के जरिये बसपा पहले ही ब्राह्मण वोटबैंक में सेंध लगाने की फिराक में है. आसान शब्दों में कहें, तो मायावती ने यूपी की सियासत में ब्राह्मणों को नया 'दलित' मान लिया है.

भाजपा के साथ ब्राह्मणों को निराश ही लगी हाथ

हाल ही में हुए नरेंद्र मोदी सरकार के बहुप्रतीक्षित मंत्रिमंडल विस्तार में उत्तर प्रदेश को खास तवज्जो दी गई थी. आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस मंत्रिमंडल विस्तार में सियासी समीकरणों को साधने के लिए दलित और ओबीसी समुदाय को महत्व दिया गया. लेकिन, ब्राह्मण समाज के समर्थन पाने को लेकर भाजपा का कोई खास प्रयास नहीं दिखा. उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और अति पिछड़ों की हितैषी पार्टी की छवि बनाने के चक्कर में भाजपा ने ब्राह्मण वोटबैंक को दरकिनार कर दिया. हालांकि, भाजपा ने एक ब्राह्मण को मंत्रिमंडल में जगह दी है. लेकिन, वो भी राज्य मंत्री से ऊपर की जगह नहीं बना सके. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश से मोदी सरकार में केवल दो ब्राह्मण मंत्री महेंद्रनाथ पांडेय और अजय मिश्र ही नजर आते हैं. भाजपा में संगठन से लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में ब्राह्मणों का दायरा सिमटता जा रहा है. वहीं, योगी सरकार में भी गिने-चुने मंत्रियों को छोड़कर ब्राह्मण समुदाय का कोई खास दबदबा नजर नहीं आता है.

हालांकि, ब्राह्मण समुदाय का समर्थन खोने के डर से भाजपा ने कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद को पार्टी में शामिल कराया है. लेकिन, विकास दुबे एनकाउंटर को अगर आपराधिक मामला मानकर नजरअंदाज भी कर दिया जाए, तो प्रदेश में हुई कई अन्य घटनाओं से कहीं न कहीं भाजपा के खिलाफ ब्राह्मण समाज में रोष पैदा हो गया है. भाजपा अपने इस सियासी समीकरण को सुधारने की हर संभव कोशिश में लगी हुई है. लेकिन, आबादी के लिहाज से भाजपा की योगी सरकार में ब्राह्मणों के हाथ कुछ खास नहीं लगा है. वैसे, राजनीति में महिलाओं को साइलेंट वोटर के तौर पर जाना जाता है. लेकिन, यूपी की सियासत में साइलेंट वोटर का खिताब ब्राह्मणों को दिया जाता है. यूपी के 10 फीसदी ब्राह्मण वोटों को साधे बगैर सत्ता में आना किसी भी सियासी दल के लिए आसान नहीं रहा है. आसान शब्दों में कहें, तो जिस राजनीतिक दल के सबसे ज्यादा ब्राह्मण विधायक बने हैं, यूपी में सत्ता का सुख उसी को मिला है.

परशुराम की मूर्तियों के सहारे सपा बना रही राह

भाजपा के सामने खुद को सबसे मजबूत विपक्षी दल मानकर चल रही सपा भी ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने की कोशिशों में लगी हुई है. दरअसल, अखिलेश यादव को यादव और मुस्लिम समीकरण पर चलने वाला नेता माना जाता है. लेकिन, सपा को इस बार समझ में आ चुका है कि केवल यादव और मुस्लिम वोटों के सहारे भाजपा को हराना आसान नहीं होगा. सपा में कोई प्रमुख ब्राह्मण चेहरा भी नहीं है, जो प्रदेश स्तर पर धमक रखता हो. इसी वजह से अखिलेश यादव की सहमति लेकर प्रदेशभर में परशुराम की मूर्तियां लगाने की योजना पर काम किया जा रहा है. कुछ जिलों में परशुराम की मूर्तियां लगाने का काम पूरा भी हो चुका है. लेकिन, ब्राह्मणों का समर्थन पाने के लिए सपा खुलकर मैदान में नहीं आ पा रही है. अगर ऐसा होता है, तो सपा को यादव और मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगने का भी खतरा है.

कांग्रेस खुद अपना अस्तित्व बचाने में जुटी

तीन दशक से यूपी में सत्ता का वनवास झेल रही कांग्रेस के सामने अपने मृतप्राय हो चुके संगठन को फिर से खड़ा करने की चुनौती है. कांग्रेस को लंबे समय तक ब्राह्मण समुदाय का साथ मिलता रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने ब्राह्मण समुदाय पर फिर से पकड़ बनाने के लिए दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत शीला दीक्षित को यूपी में ब्राह्मण सीएम फेस के तौर पर पेश किया था. लेकिन, सपा के साथ गठबंधन के चलते कांग्रेस की ये कोशिश फेल हो गई थी. इस बार माना जा रहा है कि प्रियंका गांधी मुख्यमंत्री का चेहरा होंगी. लेकिन, ऐसा होता नहीं दिख रहा है, तो संभावना है कि कांग्रेस एक बार फिर से किसी ब्राह्मण चेहरे को आगे लाने की कोशिश करे. कांग्रेस पार्टी संगठन में भी ब्राह्मणों को शीर्ष पद देने पर विचार कर रही है. लेकिन, फिलहाल सपा और बसपा जैसे दलों के बीच कांग्रेस खुद का अस्तित्व बचाने की कोशिशों में ज्यादा लगी हुई है.

ब्राह्मणों के लिए बसपा कर रही खुलकर बैटिंग

सपा द्वारा परशुराम की मूर्तियां लगाने की योजना सबसे पहले मायावती के निशाने पर आई थी. बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा था कि सत्ता में आने पर हम सपा से भी ऊंची परशुराम की प्रतिमा लगाएंगे. बसपा हमेशा से सर्व समाज की राजनीति करती रही है. अखिलेश यादव सरकार ने सत्ता में आने के बाद दलितों और अन्य महापुरुषों के नाम पर बनाए गए संस्थानों और जगहों का नाम बदल दिया था. खैर, इस बात में कोई दो राय नहीं है कि मायावती अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले के साथ खुलकर बैटिंग कर रही हैं. 2007 में इस फॉर्मूले के साथ कमाल करने वाली बसपा के लिए ब्राह्मण वोटर काफी अहम हो जाते हैं. परशुराम की मूर्ति हो या भाईचारा कमेटी बसपा ने ब्राह्मणों को साथ लाने के लिए हर मुमकिन दांव खेलना शुरू कर दिया है. जो भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजाने लगा है. अगर बसपा अपने दलित वोटबैंक के साथ ब्राह्मण वोटरों को साधने में कामयाब हो जाती है, तो 2007 का प्रदर्शन दोहराना मायावती के लिए कोई बड़ी बात नहीं होगी.

लेखक

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय