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Updated: 12 जनवरी, 2019 05:49 PM
प्रीति 'अज्ञात'
प्रीति 'अज्ञात'
  @pjahd
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लेखकों की दुनिया में 'विश्व पुस्तक मेला' एक बहुत बड़ा आयोजन माना जाता है. लेखक, प्रकाशक, पाठक तीनों से यदि एक साथ मुलाकात करनी हो तो इससे बेहतर कोई स्थान नहीं. पुस्तकों के विमोचन और प्रचार-प्रसार के साथ अलग-अलग शहरों में रहने वाले मित्रों से एक साथ मिल पाना भी यहीं संभव है. इसी कारण इस मेले को लेकर खासा उत्साह बना रहता है. सोशल मीडिया पर भी 9-10 दिनों तक इसकी खूब धूम मची रहती है. लेकिन दिल्ली से बाहर के लोगों के लिए पुस्तक मेले में जाना बिटिया के ब्याह जैसा है.

पुस्तक मेला, दिल्ली, दिल्ली पुस्तक मेला, जीवनशैली, साहित्य दिल्ली में लगने वाले पुस्तक मेले की तैयारी भी लोग वैसे ही करते हैं जैसे पुस्तक मेला न हो शादी हो

पहले तो सभी उपलब्ध शुभ तिथियों में से एक को चुनकर दिवस सुनिश्चित किया जाता है. उसके बाद जान-पहचान वालों, दूर-पास के रिश्तेदार, मित्र आदि को इसकी पूर्व सूचना दे दी जाती है. तत्पश्चात विविध प्रसंगों और मौसम के हिसाब से वस्त्रों का चयन होता है. महिलाओं को ब्यूटी पार्लर जाना पड़ता है तो पुरुष भी युवाओं की श्रेणी में पिछले 50 वर्षों से अपना स्थान पक्का करते हुए इस बार भी स्लेटी बालों को काले में बदलने हेतु गार्नियर मेन का डिब्बा चुपके से खरीद लाते हैं. सेलेब्रिटी लुक को प्राथमिकता देने के बाद अब कुछ लोगों को इस बात की परेशानी से भी दो-चार होना पड़ता है कि गोष्ठी में ऐसा क्या धांसू पढ़ें कि श्रोताओं की आंखों से आंसू बहने लगें.

जुगाड़-तंत्र और अव्यवस्था के विरुद्ध क्रांतिकारी पोस्टों से पाठकों का सीना छलनी कर उन्हें भावुकता के सागर में डुबोने वाले साहित्यकार तय रचनाओं के अतिरिक्त अपनी 8 अन्य रचनाएं उन गोष्ठियों के लिए बैकअप में रखते हैं जहां बिन बुलाये बेधड़क घुसा जा सकता है. उपहारस्वरुप देने के लिए अपनी उन पुस्तकों का गिफ्ट रैप बना गट्ठर तैयार कर लिया जाता है जिनके प्रकाशक महोदय इस बार स्टाल लगाने की भारी-भरकम राशि देने में असमर्थ रहे. ये ठीक वैसा ही है जैसे कि कोई बड़ा-बूढ़ा अस्वस्थता के कारण ब्याह में न जाने पर लिफाफा भिजवा दिया करता है.

पुस्तक मेला, दिल्ली, दिल्ली पुस्तक मेला, जीवनशैली, साहित्य पुस्तक मेले की एक अच्छी बात ये है कि इसमें हर वो किताब मिल जाती है जो हमें चाहिए होती है

इन सारी तैयारियों के बाद घटनास्थल से सीधा प्रसारण प्रारंभ होता है. प्रथम चरण में रेलवे स्टेशन या एअरपोर्ट के विहंगम दृश्य के साथ कुछ पंक्तियां नजर आती हैं जिन्हें पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि यहां तक आने के लिए इस इंसान ने जिन भीषण कठिनाइयों का सामना किया, उतना तो देश को आजाद कराते वक्त हमारे परमपूज्य स्वतंत्रता सेनानियों को भी नहीं हुआ होगा. सहानुभूति और प्रेम की ठंडी छांव से भरी प्रतिक्रियाएं यह सुनिश्चित कर पाने में सफल होती हैं कि कौन-कौन उससे दिल से मिलना चाहता है और कौन बच निकलना.

द्वितीय चरण में ट्रेन की बर्थ पर बैठ खाने के फोटो, मोबाइल बैटरी के ख़त्म होने के मार्मिक किस्से, टैक्सी इत्यादि बातों पर सार्थक चर्चा होती है. कभी-कभी विषयांतर हेतु बाथरूम की ख़स्ता हालत पर अफसोस और रेलवे का निंदा रस भी चलता है. इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरते हुए हौले-हौले अब ये नाजुक कदम तृतीय चरण की ओर बढ़ते हैं और अंततः वह घड़ी आ ही जाती है जहां चेहरे पर हीरो-हीरोइन की माफ़िक मुस्कान धारण करते हुए गेट नंबर 7 से प्रवेश करना होता है. अरे हां, उससे पहले मुख्य द्वार पर लगे पुस्तक मेले के होर्डिंग के साथ चित्र खिंचाना भी प्रोटोकॉल में आता है. शादी के वेन्यू पर पहुंचकर फोटुआ नहीं खिंचाते क्या, बुड़बक?

चतुर्थ चरण में नेत्र और नेट के द्वारा संपर्क किया जाता है और एक-एक कर उन सभी के गले लग प्रसन्नता का वह भाव जागृत होता है जैसा कि अपने चचेरे, ममेरे, मौसेरे, फुफेरे भाई-बहिन को देखकर उत्पन्न होता आया है. वही हंसी, ठहाके और पीठ पर धौल जमाकर मस्ताना कि बाकी लोग भी पलटकर देखने लगें. उसके बाद वह अमृत पेय मंगाया जाता है जो इस बंधन को सदा के लिए जोड़ देता है.

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जी हां, चाय चाय चाय. तत्पश्चात एक स्टाल से दूसरे स्टाल पर फुदकने, पुस्तकें खरीदने, विमोचने, बड़े-छोटे, ऊंचे-नीचे सभी प्रकार के मनुष्यों के साथ सेल्फियाने का सुन्दरतम दौर चलता है.

अंतिम चरण में भारी मन और खाली जेब के साथ पुस्तकों के थैले को घसीटते हुए बस पर चढ़ाने का समय आ जाता है और नम आंखों से हॉल नंबर 12-A को विदाई दी जाती है. वैसे यहां ये स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मेले में इसके अलावा भी कई हॉल हैं पर चूंकि वहां के अपडेट नहीं दिखते तो उन्हें गिना ही नहीं जाता. जैसे घर के छोटे सदस्य भी तो शादी के समय कितनी दौड़भाग करते हैं पर मंच पर दूल्हा-दुल्हिन को निहारते, प्रशंसा करते लोगों के बीच उनका यह योगदान वीरगति को प्राप्त होता है.

और हां, जो टिकट कराने के बाद भी जा नहीं पाता... उसकी हालत उस इंसान की तरह होती है जिसकी सगाई होने के कुछ ही दिन बाद रिश्ता टूट गया हो. और वो अपने दुःख से दुखी होने की बजाय इस सदमे से इसलिए नहीं उबर पाता कि लोग क्या कहेंगे.

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लेखक

प्रीति 'अज्ञात' प्रीति 'अज्ञात' @pjahd

लेखक ब्लॉगर और 'मध्यांतर' की ऑथर हैं

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