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Updated: 29 मार्च, 2021 02:08 PM
सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
  @siddhartarora2812
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अज्ञान होना तब तक बुरा नहीं है जबतक जानने की लालसा बनी रहे. बल्कि अनभिज्ञ होना बहुत ज़रूरी है. मूर्खता के भी अपने ही मज़े हैं. एक रोज़ मैंने किसी फेसबूक पेज पर बड़े खूबसूरत से पोस्टर पर quote लिखा देखा, 'इस सही और गलत के पार एक दुनिया है, वहां मिलूंगा मैं तुझे' और नीचे लिखा था रूमी. मैं सोचूं कि इस पेज एडमिन ने कमीनेपन में इम्तियाज़ अली का क्रेडिट खुद को दे दिया है, ये लाइंस तो इम्तियाज़ ने रॉकस्टार के लिए लिखी थीं. मज़े की बात, मैंने ये बात वहां कॉमेंट्स में लिख भी दी. यूं तो कॉमेंट के रिप्लाईकर्ता का मुंह दिखाई नहीं देता, पर वो पक्का बुक्का फाड़कर मेरी अज्ञानता पर हंसा होगा. लेकिन, उस शिष्ट व्यक्ति ने, जो कोई भी वो था. बड़ी सहजता से मुझे बताया कि जनाब रूमी एक सूफी पोएट हुए हैं, ये अरिजनली उनका कथन है. मैं बुरी तरह झेंप गया. तुरंत ऑनलाइन ढूंढा, पढ़ा, सनकियों की तरह रात-रात भर रूमी का लिखा पढ़ा और कविताओं की एक अलग ही दुनिया में घुसा. बुल्ले शाह को मैं इत्तेफाक़न ज़रा पहले से जानता था, फिर उनका लिखा भी (खांटी पंजाबी में) फिर पढ़ा, कुछ समझा कुछ सिर के पार गया.

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लेकिन सीखने को बहुत कुछ मिला, अभी भी मिलता है. मुझे खुद करेक्ट करना भी अच्छा लगता है, कोई इधर का उधर लिख दे तो कोशिश करता हूं कि धीमे से बता दूं, ऐसे बताऊं कि बुरा भी न लगे और जानकारी भी मिल जाए. साथ ही जानने के लिए भी ढेर उत्सुक रहता हूं. एक भाई ने कभी बताया था कि वाक्य खत्म होने के बाद स्पेस देकर पूर्णविराम लगाते हैं, मैं उनकी बात को फॉलो करने लगा, हालांकि बहुत सी किताबों में ऐसा होता नहीं दिख रहा था, वाक्य खत्म होते ही पूर्णविराम लगाने की प्रथा चली आ रही थी, फिर भी कुछ दिन फॉलो किया.

तब जाकर एक शख्स ने करेक्ट किया जो उन भाईसहब के भी उस्ताद सरीखे थे, अच्छी बात ये हुई कि उन भाईसाहब ने भी सार्वजनिक रूप से सबके सामने (बिना मेरे कहे) ये माना की उन्होंने गलत बताया था. कौन गलत था कोई सही, ये मुद्दा ऐसी बहस का है जो कभी खत्म नहीं हो सकता लेकिन किसी के टोकने से, किसी को टोकने से, खुद की और सामने वाले की भी जानकारी में कुछ इज़ाफ़ा होता है तो मुझे उसमें कोई हर्ज़ नहीं नज़र आता.

ये लोग न टोकते, मैं गलत न बोलता तो सही कैसे कहता? ऐसे ही, बचपन की बात है. कोई कहानी थी, मैंने पापा से सुनी थी. मैंने अपनी टीचर को सुनाई तो उन्होंने कहा वाह बेटा, आप मुंशी प्रेम चंद को भी पढ़ते हो? मैंने कहा नहीं, ये मेरे पापा ने सुनाई है, पापा ने प्रेम चंद अंकल को भी सुनाई होगी और उन्होंने इस कहानी को अपना बता दिया होगा. अब शिक्षिकाओं के बीच कई दिन तक ये प्रसंग हंसने का बहाना बना रहा था.

मैं फिर भी मानकर राज़ी नहीं था कि ये प्रेमचंद की कहानी है. कहानी शायद ईदगाह थी. पॉइंट ये है कि सीखना, समझना बहुत ज़रूरी है और उस ज़रूरत को पूरा करने के लिए अज्ञान होना बहुत ज़रूरी है. लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू, सिखाने वाले को भी सिखाने और टोंट करने में फ़र्क मालूम होना चाहिए. मेरे कुछ अग्रज हैं, उनके पास बहुत गया है. साहित्य और फिल्मों से जुड़ी हर बारीक बात उन्हें यकीनन पता होगी लेकिन कोई गलती देख लें या उनसे कुछ पूछ लो तो ऐसे बिहेव करते हैं मानों हम अछूत हों.

ऐसे घमंड करते हैं, बताने से पहले सौ बार जताते हैं कि उन्हें पता है और हमें नहीं पता. और हमें नहीं पता तो हमने गलत बोलने की, लिखने की हिमाकत कैसे की? बाखुदा सीखने की इच्छा ही मर जाती है. लगता है सेठ, अपना ज्ञान अपने पास मर्तबान में तबतक रखो जब तक इसका अचार न बन जाए. वहीं कोई तरीके से बताने वाला मिलता है तो बिल्कुल मूर्ख होकर, एकदम ज़ीरो से जानने का मन करता है. लगता है जो नहीं पता उसे भी फिर जान लेते हैं, क्या पता कुछ उसमें भी नया मिल जाए, नहीं भी मिला तो यही कन्फर्म हो जायेगा कि हमें सही पता है कि नहीं?

ऐसे ही हमारे गुरुजी के नाम से मशहूर नींजा चाचा हैं, इनके सामने कोई बात गलत बोल दो तो ये कोरेक्ट नहीं करते, ये व्यंग्य करते हैं लेकिन इस तरह करते हैं कि आपको बुरा भी नहीं लगता और आप सही बात सीख भी जाते हो. जब मेघना गुलज़ार की फिल्म तलवार रिलीज हुई थी, तब मैं पहला शो देखकर आया था, उसमें एक डायलॉग था, 'वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे किसी खूबसूरत मोड़ पर छोड़ देना अच्छा.'

इत्तिफाक़ से किसी की पोस्ट पर इसी से जुड़ी बात हुई तो मैंने फट से ये शे'र लिखा और आगे लिख दिया by गुलज़ार. हमारे गुरुजी ने तपाक से रिप्लाई किया - 'अच्छा, ये गुलज़ार ने लिख दिया, हमारे टाइम पर तो सेम शेर साहिर लुधियानवी लिखते थे.'

कुछ ऐसा ही सरकाज़म मारकर उन्होंने मेरे साथ-साथ उस कॉमेंट को पढ़ने वाले एक दर्जन लोगों के दिमाग में ये हमेशा के लिए फिट कर दिया कि ये साहिर का लिखा है. ऐसी ही किसी कॉन्फिडेंट बेवकूफी से जुड़ी कोई बात आपको याद आती है क्या? जब आप खम ठोककर किसी बात को बोल रहे हों कि यही सही है और बाद में पता चले अरे धत्त, हम तो बुद्धू थे? होली का हफ्ता है, कुछ भी बता सकते हो, कोई बुरा नहीं मानेगा, आप भी मत मानना, वैसे भी मूर्खतापूर्ण बात तब बताने में कोई हर्ज़ नहीं रह जाता जब हम उस मूर्खता से पार निकल चुके हों.

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लेखक

सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' @siddhartarora2812

लेखक पुस्तकों और फिल्मों की समीक्षा करते हैं और इन्हें समसामयिक विषयों पर लिखना भी पसंद है.

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