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 |  6-मिनट में पढ़ें  |   30-03-2018
संध्या द्विवेदी
संध्या द्विवेदी
  @sandhya.dwivedi.961
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''लालटेन काहे नहीं जला रही, हाथन मा मेंहदी लगी है का? बहुरिया ने धीरे से कहा, अरे न अम्मा, लागथ है तेल नहीं है. अम्मा आग-बबूला, अरे तेल का लालटेन पी गई. कालही तो भरे रहें. बहुरिया ने अम्मा की बड़बड़ाहट को अनसुना करते हुए कहा, हां अम्मा हम सही कह रहे थे. तेल पेंदी में बस चपका भर है.

अम्मा बुदबुदाईं, लागथ है पेंदी चटक गई है. सब तेल रिस गवा...बहुरिया, हां अम्मा तेल लीक हुई गवा...तेल लीक हुई गवा? कइसे?'' तमतमाई अम्मा ने इस तेल लीक होने की घटना पर ऐसे प्रतिक्रिया दी मानो तेल न हुआ निजी डेटा हो गया. जैसे इन दिनों दुनियाभर से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. और लोग बेचारे मार्क जुकरबर्ग की लानत-मलानत कर रहे हैं. दादी ने भी तेल लीक पर उतनी ही फजीहत अपनी बहू की करती थीं जितना इन दिनों डेटा लीक होने पर जुकरबर्ग की हो रही है. दादी गुस्से से लाल, तमतमाई- 'हमाई किस्मत में ही फूहड़ बहू लिखी थी परमात्मा...! किस्मत फूट गई.' फिर कोसती हुई अम्मा अपनी बहू को झिड़कते हुए कहती हैं ''अब का पूरी रात बैठ के बिजली का इंतजार करें. 'या दिया बाती कुछ जलइहो..हां, हां अम्मा बस अबहीं जलाए रहे....'' ये उन दिनों की बात है जब घर-घर में इन्वर्टर नहीं हुआ करते थे.

oil lampसांकेतिक फोटो

बिजली कटना रोज की बात थी. लालटेन और डिभरियां एक जरूरी वैकल्पिक व्यवस्था होती थी. और अगर कभी ऐसा हो जाए कि लालटेन और डभरियों में तेल न मिले तो उस घर की औरतों/लड़कियों को बेलौस फूहड़ के तमगे से नवाजा जाता था.

बिजली तो आज भी जाती है गांवों और छोटे शहरों में. लेकिन उतनी नहीं जितनी उन दिनों जाती थी. खैर एक और वैकल्पिक व्यवस्था थी कटिया....एक बड़ा सा डंडा उस पर लोहे का कांटा इस तरह से लगा रहता था कि तार उसमें फंसे और खंभों से निकले तार पर उसे फेंका जा सके...कानपुर के तो घर-घर में सरकारी बिजली को शातिराना ढंग से चुराने वाला कटियाबाज होता था. माएं ऐसे लड़कों की बलैयां लेती थीं. लें भी क्यों न घर को जो रौशन कर दे उसे ही तो कुलदीपक कहते हैं...

खैर...बात चल रही थी 'लीक' होने की तो भइया केवल रौशनी का बेहद महत्वपूर्ण जरिया लालटेन की तली ही लीक नहीं होती थी बल्कि घरों में लगे पाइप भी लीक होते थे. सुबह-सुबह उठकर अम्मा की वो आवाज कानों में पिघले शीशे की तरह पड़ती थी.

भगवान क्या-क्या दिन दिखाओगे बदबूदार पानी भी पिलाओगे..ये सुनते ही दादी का सरकार को कोसना- 'हैजा लगे इस सरकार को. जब महात्मा गांधी प्रधानमंत्री थे तो मजाल की पानी में बदबू आ जाए.' कई बार दादी को बताया महात्मा गांधी कभी देश के प्रधानमंत्री नहीं रहे.

वो हर बार गुस्साकर कहती..अब कल की पैदा हुई तुम हमें बताओगी महात्मा गांधी कौन थे...अरे हमाए बाप आजादी की लड़ाई लड़े थे....लेकिन एक बात तय थी कि पानी में बदबू नहीं होनी चाहिए इसकी जिम्मेदारी सरकार की है ये दादी को पता था. अब उधर से मोहल्ले का ही एक हुनरमंद प्लंबर...अरे-अरे उसका पेशा ये नहीं था..वो तो बस मोहल्लागीरी करने में माहिर था. कॉलोनी में किसी को जरूरत हुई नहीं कि वो हाजिर और फिर इन हुनरमंद जनाब ने गंभीर होकर कहा- 'चाची इस बार हमाए बस की नहीं, प्लंबर बुलाना पड़ेगा. लगता है गटर वाला पाइप लीक हो गया है'.

चिंता में डूबी चाची थोड़ा जोर देते हुए कहतीं...'अरे बउवा थोड़ा जुगाड़ लगाओ...कुछ दिन चल जाए फिर तुम्हाए चाचा आ जाएंगे...फिर करें उन्हें जो करना है!!!' 'अरे चाची पिछली बार मामला इतना गंभीर नहीं था, हम बना दिए थे लेकिन इस बार तो पूरा पाइप चटका नहीं फूटा पड़ा है.'

महीने दो महीने में एकाध बार पाइप लीक होने और दो चार दिन में तेल लीक कांड घर-घर में होता ही था. हां एक और बात परीक्षा में पेपर भी लीक होता था. और घरों की बेहद निजी बातें जैसे फलानी की लड़की का चक्कर किससे चल रहा है, फलाने घर में बिटिया को देखने लड़के वाले आए थे. वो बात अलग है कि तब न फेसबुक था और न ट्विटर. सच बात तो यह है कि मुंआ सोशल मीडिया स्यापे की असली जड़ है. हमें तो पहले से ही अंदेशा था इस सोशल मीडिया का. बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं, तो फिर ये तो इंटरनेट है, जहां दुनियाभर की खबरें उतराया करती हैं.

अब देखिए न सोशल मीडिया होता और न लीक हुआ पर्चा वायरल होता है, और न इतना हंगामा कटता. और हद तो ये है कि अब सोशल मीडिया खुद ही लीक कर रहा है. हम तो कहते हैं जैसे गाय हत्या पर रोक लगा दी वैसे ही 'सोशल मीडिया' पर लगा दें. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. आज अगर दादी जिंदा होतीं तो फिर कहती 'हैजा लगे सरकार को..आज अगर महात्मा गांधी होते तो...'.

paper leakपेपर लीक तो पहले भी होते थे !

खैर तो भइया बताना ये चाह रहे थे कि ये लीक कांड पहली बार नहीं हुआ है. इसके प्रमाण अतीत में भी पाए जाते हैं. इसलिए अब जब इस लीक कांड का अपडेट वर्जन आ ही गया है तो सुनने में आ रहा है कि सरकार ने मिनिस्ट्री ऑफ लीक बनाने का मन बना लिया है. देश में जो जो भी लीक हो रहा है उसकी समस्याओं का समाधान इस मिनिस्ट्री में किया जाएगा. चलो मन में तसल्ली हुई कि कम से कम एक ठिहा तो होगा जहां लीक होती व्यवस्था के खिलाफ शिकायत दर्ज हो सकेगी..!

मीडिया को भी कुछ नया मिलेगा और ये फलां-फलां मामलों के जानकार या विशेषज्ञों की फेहरिस्त में लीक मामलों के जानकार के नाम भी जुड़ने लगे हैं. पहले तो हमें लगा था कि लीक मामलों के जानकार मीडिया को मिलेंगे कहां से, लेकिन पता चल रहा है कि सालों से कई लोग इस मामले में अपनी दक्षता बढ़ा रहे थे. कई पत्रकारों ने तो इस बार के लोकसभा चुनाव होने के एक साल के भीतर ही अपने रेज्यूमे में 'लीक मामलों के जानकार' लिखना शुरू कर दिया था.

ऐसे ही एक लीक मामलों के जानकार से हमने धीरे से पूछा आपने इस मसले पर पहले कुछ लिखा-पढ़ा या बोला है, तो वे गुर्राए और कहा लिखना-पढ़ना क्या होता है जी, अनुभव की कढ़ाही में पके हैं हम. मैंने धीरे से कहा नहीं आपके अनुभव या दक्षता पर सवाल नहीं उठा रही बस इतना पूछ रही हूं कि आपको कैसे अंदाजा हो गया कि आने वाले समय में लीक मामलों के जानकारों का स्कोप बढ़ने वाला है? उन्होंने कहा, पत्रकार वही जो उड़ती चिड़िया के पर गिन ले. धीरे से कानों के पास आकर उन्होंने फुसफुसाया 'चाघड़ पत्रकार वही है जो भांप ले...देश में अलग ज्वलंत मुद्दा कौन होगा...!' और जिस तरह से देश चल रहा है उसे देखकर अंदाजा हो गया था कि जल्द ही व्यवस्था लीक की समस्या विकराल होने वाली है..

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लेखक

संध्या द्विवेदी संध्या द्विवेदी @sandhya.dwivedi.961

लेखक इंडिया टुडे पत्रिका की विशेष संवाददाता हैं

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