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Updated: 28 अप्रिल, 2021 09:39 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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29 अप्रैल को सालभर हो जाएंगे. इसी दिन दुर्लभ किस्म की बीमारी (न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर) से इरफान खान का निधन हुआ था. वो हिंदी सिनेमा के बेहद चुनिंदा कलाकारों में हैं जिन्होंने कला और मसाला दोनों तरह की फिल्में कीं. अपनी शैली के बिल्कुल अलग अभिनय से 'क्लास' और 'मास' दोनों तरह के प्रशंसक तैयार किए. इरफान के बेहद करीबी रहे वरिष्ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं- "उन्होंने अपनी शर्तों पर अपनी शैली में खुद की जगह बनाई. उन्होंने किसी की नकल नहीं की."

इरफान की जब मौत हुई तब वे 53 साल के थे. इतनी जिंदगी में उन्होंने बहुत कुछ देखा. तमाम उतार-चढ़ाव और जिस मुकाम पर वो नजर आते हैं उसके पीछे के संघर्ष की कल्पना भर की जा सकती है. लोग समझते हैं कि बीमारी के बाद आख़िरी महीनों में इरफान को बेहद तकलीफ से गुजरना पड़ा. बेशक उन्होंने दुर्लभ बीमारी में बेइंतहा दर्द झेला, जिसे अजय ब्रह्मात्मज को उनकी लिखी चिट्ठी में पढ़ा जा चुका है. लेकिन उनके इंटरव्यूज और करीबियों के संस्मरण बताते हैं कि एक्टर ताउम्र कई तरह की उलझनों और संघर्ष में रहा. बीमारी की तरह ही उनका संघर्ष भी दुर्लभ था.

सार्वजनिक जीवन में होने की वजह से हालांकि उन्होंने कभी राजनीतिक मसलों पर टिप्पणी नहीं की. मगर दोस्त बताते हैं कि इसके साथ उनका संघर्ष तो था. खासकर समाज के बदलते माहौल उन्हें परेशान करते थे. एक मामूली घर का लड़का नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से ट्रेंड होकर एक्टिंग करने मुंबई आया था. 90 के दशक में मास एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का जो ट्रेंड था उसमें इरफान जैसी शक्ल-सूरत और आउट साइडर को बड़े मौके मिलने के उदाहरण ना के बराबर हैं. शुरुआती कई साल तक इरफान ने टीवी सीरियल्स और आर्ट फ़िल्में कीं. यहां भी वो सहायक कलाकार की ही भूमिका में थे. क्योंकि उस दौर में भी टीवी पर ज्यादातर फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाएं करने वालों का ही राज था. जो शुरुआती कला फ़िल्में भी कीं उसमें भी बहुत छोटे-मोटे रोल मिले थे.

दूरदर्शन के लिए रूसी कहानी पर बनी टेलीप्ले में लेनिन का किरदार निभाया. इसके बाद डर, मखदूम मोहिउद्दीन, भारत एक खोज, भंवर, भारत एक खोज और चंद्रकांता जैसे टीवी सीरियल्स में छोटी-बड़ी भूमिकाएं करते रहे और धीरे-धीरे एक पहचान बनाते गए. एंकर के रूप में भी काम किया. इरफान ने टीवी और फिल्मों में जितने तरह के काम किए शायद ही किसी अभिनेता ने किया हो.

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इरफान में एक्टिंग की भूख थी, उनके अंदर तमाम चरित्रों की उलझन थी, वो चीजों को अपने तरीके से बताना भी चाहते थे लेकिन इसके लिए रील में उनकी जगह कम थी और उसे कभी काट भी दिया जाता था. ऐसे माहौल से बोर होकर मुंबई तक छोड़ने का मन बनाने लगे. इरफान के अंदर का एक्टर डिग रहा था. मगर उनकी मध्यवर्गीय चिंताओं ने रास्ता रोक लिया- "घर कैसे चलेगा?" करीब एक दशक से ज्यादा के संघर्ष के बाद 2001 में "द वॉरियर" ने नए दरवाजे खोल दिए. ये सिनेमा का वो दौर है जब मसाला ऑडियंस भी चिकने-चुपड़े चेहरों के साथ उम्दा अभिनय करने वालों को पसंद करने लगी. दरअसल, दर्शक अब ज्यादा परिपक्व था और उम्दा अभिनय, कहानियों में प्रयोग और गंभीर किस्म की फिल्मों को देख लिया करता था. आदत जो बदल रही थी.

इसके ठीक दो साल बाद आई विशाल भारद्वाज की मल्टी स्टारर "मकबूल" और पॉलिटिकल ड्रामा "हासिल" के उम्दा किरदारों ने इरफान का जीवन ही बदल दिया. फिर तो एक्टिंग का सिलसिला ऐसा बढ़ा कि वो बॉलीवुड की लोकप्रिय जमात में अगली कतार के अभिनेताओं में शामिल हो गए. एक अभिनेता जिसकी टीवी में हैसियत लगभग जूनियर एक्टर की ही रही, वो अपनी अलग शैली के अभिनय से लाइफ ऑफ़ पाई, इन्फर्नो, जुरासिक वर्ल्ड, जंगल बुक, स्लम डॉग मिलेनियर के जरिए अंतरराष्ट्रीय शोहरत कमा रहा था.

हिंदी की क्लास और मॉस फिल्मों में लीड या सेकंड लीड करने लगा था. द नेमसेक, लाइफ इन अ मेट्रो, क्रेजी 4, मुंबई मेरी जान, न्यूयॉर्क, ये साली जिंदगी, सात खून माफ़, पान सिंह तोमर, साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स, लंच बॉक्स, डीडे, हैदर पीकू, तलवार, मदारी, हिंदी मीडियम, करीब करीब सिंगल, ब्लैक मेल, कारवां और अंग्रेजी मीडियम जैसी दर्जनों फ़िल्में गिनाई जा सकती हैं. इनमें कई टिकट खिड़की पर बेहद कामयाब रहीं.

इरफान के करीबियों ने कई बार बताया है कि वो बहुत भावुक और संवेदनशील इंसान थे. बहुत ही पारिवारिक किस्म के भी. हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे. खुद भी कई बार इसका जिक्र किया. उनका पुश्तैनी घर जयपुर के पुराने शहर में है. पिता का नाम यासीन था जो टायर का बिजनेस करते थे. मां का नाम सईदा बेगम था. इरफान के तीन और भाई बहन हैं. जड़ों से इस कदर जुड़े थे कि सेलिब्रिटी बनने के बाद पतंगबाजी के बहाने जयपुर आ जाया करते थे. इसी शहर में उन्हें एक्टिंग के भूत ने पकड़ा था और रविद्र मंच के रास्ते दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा पहुंच गए. इसके बाद की बातें जान ही चुके हैं.

एनएसडी ने इरफान को दो चीजें दीं. एक तो उनका हुनर निखरा और 1985 में जीवन की सबसे गहरी दोस्त सुतपा से मुलाक़ात हुई. ये गहराई इतनी बढ़ी की बाद में दोनों मुंबई में एक कमरे के मकान में साथ रहे और फिर शादी कर ली. सुतपा ने मुंबई के शुरुआती दिनों में नौकरी की और इरफान को काफी सपोर्ट किया. इरफान के दो बच्चे हैं- बाबिल और अयान. 2011 में पद्मश्री से सम्मानित हुए इसके अलावा नेशनल अवार्ड, फिल्म फेयर अवार्ड और दुनियाभर के कई सम्मान हासिल किए. इरफान ने शोहरत के साथ बेशुमार पैसे भी कमाए लेकिन मुंबई में उनका दायरा बहुत सीमित था. इतना कि पार्टियों में नहीं जाते थे. ज्यादर शुरुआती दिनों के ही लोग अंत तक उनके करीबी बने रहे. मुंबइया सेलिब्रिटीज वाला तामझाम उनमें कभी नहीं दिखा. शोहरत बटोरने के लिए उन्होंने कंट्रोवर्सीज वाला पीआर स्टंट भी नहीं किया. राजनीति से उन्हें एलर्जी थी. लोग कहते हैं कि विवाद ना हो इसलिए वो चुप रहे. मगर सवालों का गुबार उनके अंदर भरा था. सार्वजनिक नहीं हुआ.

मौत से कुछ ही दिन पहले जयपुर में मां का इंतकाल हुआ था. उस वक्त देश कोरोना महामारी के सख्त लॉकडाउन में था. सिर्फ कुछ चीजों को छोड़कर जो जहां था वहीं ठहरा हुआ था. इरफान बीमार भी थे. वो मां की आख़िरी रस्म में नहीं जा पाए. वीडियो कॉल से विदा किया. लेकिन जब इरफान की मौत हुई उससे ठीक पहले उन्होंने कहा- "अम्मा मुझे लेने आई हैं."

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल में पत्रकार हैं.

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