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Updated: 09 अगस्त, 2016 02:50 PM
धर्मेन्द्र कुमार
धर्मेन्द्र कुमार
  @dharmendra.k.singh.167
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सवा सौ करोड़ लोगों से भरा अपना देश और ओलंपिक खेल में सवा मेडल भी लाने का दम नहीं. ये सचुमच में डूब मरने वाली भी स्थिति है क्योंकि हर चार साल पर हम भव्य तैयारियों का हवाला देकर कई मेडल लाने का दावा करते हैं. अब रियो ओलंपिक का ही हाल देखिए.

हमारे प्रधानमंत्री ने 118 लोगों की फौज को भेजते वक्त कहा था कि इस बार हर खिलाड़ी पर डेढ़ करोड़ खर्च किया गया है और इस बार पुराने सारे रिकॉर्ड टूटेंगे. हालांकि अभी रियो ओलंपिक खत्म नहीं हुआ है मगर पहले 3 दिन में ही निशानेबाज अभिनव बिंद्रा, गगन नारंग, मानवजीत सिंह संधू, हीना सिद्धू जैसे नामचीन एथलीट का निशाना चूक गया है.

आलम ये है कि बीजिंग ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले अभिनव बिंद्रा जब 8 साल बाद चौथे पोजीशन पर आते हैं तो हम आहें भरते हैं. ये कहकर अपने दिल को तसल्ली देते हैं कि पदक आते-आते रह गया.

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सच्चाई तो ये है कि पदक आते-आते नहीं रह गया बल्कि हमारे एथलीट दुनिया के टॉप एथलीटों के सामने इतने बौने हैं कि वो पोडियम तक पहुंच ही नहीं पाते.

मेडल कहां से आएगा, कौन लाएगा?

हर बार नाकामियों पर बहाने बनाए जाते हैं ... फिर दावे और वादे का नया दौर चलता है कि अगली बार प्रदर्शन बेहतर होगा. मगर कब और कैसे हालात बेहतर होंगे इसको जानने के लिए मेडल की ये तस्वीर भी देख लीजिए. 116 साल के ओलंपिक इतिहास में रियो से पहले भारत ने 23 ओलंपिक में हिस्सा लेकर कुल 26 मेडल हासिल किए. यानी औसत निकाले तो हर ओलंपिक में सवा मेडल भी नहीं बनता. किसी एक ओलंपिक में भारत ने सबसे ज्यादा 6 मेडल लंदन में जीते थे.

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 रियो ओलंपिक 2016 में मेडल का इंतजार

अमेरिका के तैराक माइकल फेलप्स अब तक अकेले ही 23 ओलंपिक मेडल जीत चुके हैं जिसमें 19 गोल्ड मेडल शामिल है और ये संख्या इसी रियो ओलंपिक में और बढ़ेगी.

भारत ने 26 में से 9 गोल्ड मेडल जीते हैं जिसमें तो 8 हॉकी टीम के नाम हैं. यानी खिलाड़ी में सिर्फ अभिनव बिंद्रा 2008 बीजिंग में गोल्ड मेडल जीतने वाले इकलौते भारतीय खिलाड़ी हैं. अब जरा सोचिए जिस देश में लोग सोना को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं वहां ओलंपिक गोल्ड मेडल का ऐसा सूखा क्यों है?

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सबसे युवा देश खेल में इतना फिसड्डी क्यों?

जिस देश की जनसंख्या में 50 फीसदी लोग 25 साल से कम उम्र के हैं और 65 फीसदी से ज्यादा लोग 35 साल से कम उम्र के हैं. वहां खेल के प्रति लोगों के रुझान को इन मेडल से समझा जा सकता है. इतना ही नहीं, 2020 तक एक भारतीय की औसत उम्र 29 साल हो जाएगी जो चीन के औसत उम्र 37 और जापान के औसत उम्र 48 से बेहद कम होगी.

खेल में भारत का ग्रोथ रेट इतना कम क्यों?

भारत का जीडीपी लगातार बढ़ रहा है और अब 10 फीसदी का टारगेट भी ज्यादा दूर नहीं. मगर खेल में ग्रोथ रेट का क्या? सरकार चला रहे राजनेता खेलों के संगठनों पर भी कुंडली मारकर बैठे हैं. हर साल करोड़ों का बजट आता और जाता है मगर इससे ना तो खेल की हालत सुधरती दिख रही है और ना ही ऐसे खिलाड़ी निकल कर आ रहे हैं जिसे देख दुनिया के टॉप खिलाड़ी भी सोचने को मजबूर हो जाएं.

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जब थाईलैंड जैसा छोटा देश और गरीब अफ्रीकी देश भी ओलंपिक में भारत से बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो ये सोचने को मजबूर कर देता है कि खेल की दुनिया में भारत कहां जा रहा है?

भारत का ओलंपिक में 116 साल का ग्राफ चढ़ा कम है और उतरा ज्यादा है. 1900 में भारत के 1 खिलाड़ी ने हिस्सा लिया था और 2 सिल्वर मेडल जीते थे. तब वो जमाना अंग्रेजों का था. आजादी के बाद 17 ओलंपिक खेलों से महज 21 मेडल आएं हैं.

तो अब सौ टके का सवाल ये है कि 2016 ओलंपिक में 118 की फौज कितना मेडल लेकर आएगी? पहले 4 दिन के नतीजे देख ऐसा लग रहा है कि कहीं इस बार खाली हाथ ही ना लौटना पड़े. अगर इक्के-दुक्के मेडल हाथ लग भी गए तो इस पर इतराने की जरूरत नहीं है बल्कि पूरा देश ये सोचे कि इतने बड़े देश में खेल का ऐसा बेड़ा गर्क क्यों हैं?

लेखक

धर्मेन्द्र कुमार धर्मेन्द्र कुमार @dharmendra.k.singh.167

लेखक आजतक स्पोर्ट्स डेस्क में एसोसिएट एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर हैं.

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