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 |  3-मिनट में पढ़ें  |   06-09-2016
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दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट बोर्ड (सीएसए) ने जोहांसबर्ग में शनिवार को हुई अपनी सलाना जनरल मीटिंग में घोषणा की है कि भविष्य में होने वाली दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट टीम की सभी सीरीज के लिए कम से कम छह काले खिलाड़ियों को शामिल किया जाएगा.

साउथ अफ्रीकी नेशनल क्रिकेट टीम ने ये कदम उस टीम में गोरे खिलाड़ियों का प्रभुत्व कायम न होने के लक्ष्य के तहत उठाया है. इस नए नियम के तहत कम से कम 54 फीसदी काले खिलाड़ी और 18 फीसदी काले अफ्रीकी खिलाड़ी नेशनल टीम के लिए आईसीसी द्वारा मान्यता प्राप्त सभी प्रतियोगिताओं में खेलेंगे.

प्रांतीय और फ्रेंचाइजी क्रिकेट लीगों के लिए यह नियम पिछले तीन वर्षों से है लेकिन पहली बार इसे नेशनल टीम के लिए भी अपनाया गया है. 11 सदस्यों की नेशनल टीम में औसतन अधिकतम पांच गोरे खिलाड़ी होंगे और कम से कम छह काले खिलाड़ी होंगे.

साउथ अफ्रीका ने क्यों उठाया ये कदम?

यह कदम खेल मंत्री फिकिले बालुला द्वारा तीन महीने पहले उस घोषणा के बाद किया गया है जिसमें उन्होंने घोषणा की थी कि रग्बी, क्रिकेट, नेटबॉल और एथलेटिक्स जैसे खेल तब तक कोई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं कर पाएंगे जब तक कि वे कोटा सिस्टम लागू नहीं करते हैं.

लेकिन कई आलोचकों ने बालुला के इस निर्णय को राजनीतिक कदम बताते हुए इसकी आलोचना की है और कहा है कि ऐसा होने पर खराब प्रदर्शन करने वाले काले अफ्रीकी महिला और पुरुष खिलाड़ियों को भी नेशनल टीम में जगह मिल जाएगी और इससे निश्चित तौर पर साउथ अफ्रीकी टीम के प्रदर्शन में गिरावट आएगी. ऐसे खिलाड़ियों के टीम में चुनाव का आधार उनकी योग्यता न होकर कोटा सिस्टम होगा.

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दक्षिणी अफ्रीकी टीम में रंग के आधार पर आरक्षण लागू कर दिया गया है

टीम में खिलाड़ियों के चुनाव में रंगभेद का विवाद साउथ अफ्रीकी टीम में हमेशा से रहा है और टीम में सिर्फ गोरे खिलाड़ियों के चुने जाने के कारण आईसीसी ने 1970 में साउथ अफ्रीका पर इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में भाग लेने पर बैन लगा दिया था.

क्या भारत में भी उठेगी ऐसी मांग? जातिवाद के मामले में भारत से ज्यादा शायद ही कोई देश आगे हो. ऐसे में क्या साउथ अफ्रीकी टीम में काले खिलाड़ियों को आरक्षण दिए जाने के बाद भारत में भी खेलों में दलितों या अल्पसंख्यकों को लेकर ऐसी मांगें उठेंगी? अभी रियो ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली पीवी सिंधू को ही ले लीजिए. उनके मेडल जीतने के बाद गूगल पर लोगों ने उनकी जाति खूब सर्च की थी.

अभी शिक्षा से लेकर नौकरियों तक में आरक्षण लागू है लेकिन हाल फिलहाल खेलों में ऐसा करने की मांग नहीं कई गई. लेकिन आजकल जिस तरह दलितों पर अत्याचार का मुद्दा छाया है ऐसे में बहुत संभव है कि भारत में आने वाले दिनों में अपनी राजनीति चमकाने के लिए राजनीतिक पार्टियां क्रिकेट और बाकी खेलों में दलितों और अल्पसंख्यक खिलाड़ियों को आरक्षण के आधार पर चुने जाने की मांग करने लगे. उन खिलाड़ियों के चयन का आधार उनकी जाति होगी, न कि योग्यता.

ऐसे में इसमें कोई दो राय नहीं है कि खेल में आरक्षण सिस्टम चाहे साउथ अफ्रीका में लागू हो या भारत में, नुकसान खेल को ही होगा!

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