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 |  6-मिनट में पढ़ें  |   12-10-2017
कुदरत सहगल
कुदरत सहगल
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प्यारे पापा,

क्या हमारे देश की अदालत को शर्म आएगी?

पापा, मुझे पता है मैं आप लोगों से बड़ी दूर चली गई हूं. समय से पहले चली गई हूं. बहुत पहले. लेकिन पापा मैं यहां स्वर्ग से नीचे हो रहे सारे तमाशे को देख रही हूं. रोज. लगातार. मैं ठीक हूं पापा. मैं जहां भी हूं, कम से कम धरती से तो बहुती ही अच्छी जगह है.

देखते-देखते नौ साल बीत गए. कुछ पता भी नहीं चला ना पापा? मैं तो गिनती भी भूलने सी लग गई हूं. मैं भूल गई हूं कि कितने साल बीत गए आपसे बिछड़े हुए. मैं भूल गई कि इन बीते सालों में आपने कोर्ट के कितने चक्कर लगाए. मैं भूल गई जो ताने, जो इल्जाम लोगों, मीडिया ने आप पर लगाए. मैं भूल गई कि उन्होंने आपको मेरा यानी अपनी ही बेटी का कातिल कहा. कि आप अपनी लाड़ली का कत्ल करेंगे वो भी ऑनर किलिंग के नाम पर! मैं सब भूल गई पापा.

aarushi-650_101217072541.jpgपापा मैने मरकर गलती कर दी ना?

मैं तो सिर्फ एक बार मरी. लेकिन आप और मम्मी दोनों हर रोज मरते रहे. हर पल मरते रहे. हर सांस के साथ मरते रहे. उन्होंने तो आपको मेरी मौत का मातम तक नहीं मनाने दिया था. उन्होंने आप लोगों को मौका ही नहीं दिया कि मुझे याद करके मेरे कमरे में जाएं और मुझे अपने आस-पास महसूस करें. आप जब भी मेरे कमरे में जाते तो पुलिस के घेरे में जाते. वो हर समय आपके साथ रहते. आपसे तरह-तरह के सवाल करते. आपका अपमान करते. लेकिन कभी उन्होंने आपके दर्द को महसूस करने की कोशिश नहीं की. कभी ये जानने की कोशिश नहीं कि आप कितना चीखकर और कितना गला फाड़कर रोना चाहते हैं. चीखना चाहते हैं. चिल्लाना चाहते हैं.

आज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपको और मम्मी को भले बरी कर दिया है. लेकिन, इसको इस रूप में एक काला दिन भी मानना चाहिए कि जो लोग मर गए हैं, न तो उनको और न ही उनके परिवार वालों को न्याय मिलता है. बल्कि मेरे जैसे और सारे बच्चों के माता-पिता, सगे-संबंधियों को रोज शर्मिंदा करके अंत में ये नतीजा आता है कि हमारा तो किसी ने कत्ल नहीं किया था. जैसे काले हिरन को सलमान ने नहीं मारा था, जेसिका लाल को मनु शर्मा ने नहीं मारा था, ठीक वैसे ही आरुषि तलवार यानी आपकी लाड़ली को भी किसी ने नहीं मारा!

पापा अब क्या आप मेरे लिए लड़ेंगे? मुझे न्याय दिलाने के लिए लड़ेंगे? क्या मेरे और मेरे जैसे उन हजारों बच्चों के सच को बदलेंगे जिनका कोई कातिल आजतक कोर्ट को नहीं मिला!

पापा उन्होंने मेरे सारे मैसेज पढ़े. उन्होंने मेरे फोटो को देखकर मेरा चरित्र भी तय कर दिया. उन्होंने आपको और मम्मी को जज किया. क्यों? क्योंकि आप दोनों ने मुझे मेरे हिसाब से जिंदगी जीने की छूट दे रखी थी. मेरे जीवन का अंत बहुत बुरा हुआ पापा. लेकिन मेरी मौत के बाद उन्होंने मेरे इज्जत की जो धज्जियां उड़ाई हैं, पापा क्या आप उसके विरुद्ध खड़े होंगे? जब तक मुझे इन सारे सवालों का जवाब नहीं मिल जाता, मैं यहां स्वर्ग में होकर भी नर्क जैसा महसूस करूंगी.

मैंने कभी किसी इंसान को कोर्ट और कानून के दायरे के हिसाब से जज नहीं किया. हम तो ऐसे देश में रहे हैं पापा जहां लड़कियों का रेप करना 'मर्द' की पहचान मानी जाती है. जहां मेराइटल रेप जैसी कोई 'घटना' ही नहीं होती. पति ने पत्नी को मारा है ये भी प्रूफ करना पड़ता है. ये कवायद सात समंदर पार करने जितनी मेहनत से कम नहीं होती है. हमारे देश में तो लड़की की चुन्नी को ही उसकी इज्जत माना जाता है. हम वो देश हैं जहां लड़की के स्कर्ट की लंबाई उसके 'शरीफ' होने का पैमाना होता है. हम वो देश है जहां इंसाफ की देवी ने भी आंखों में काली पट्टी लगाई होती है. उसका तराजू किस पलड़े झुकेगा, ये शायद पैसा, पावर और किस्मत से तय होता है.

न्याय. ये शब्द अब मेरे लिए सिर्फ एक शब्द ही बनकर रह गया है. एक ऐसा शब्द जिसकी कोई सीमा नहीं. जिसका कोई अर्थ नहीं. जिसकी कोई परिभाषा नहीं.

लेकिन मैं कौन हूं पापा? कोई नहीं. एक अनजान लड़की जिसे इस स्वर्ग के लोग भारत की पैदाइश कहते हैं. जी हां पापा. भारत यहां ठीक वैसा ही संबोधन है जैसा चिंकी, बिहारी और भईया है. एक ऐसा देश जहां न्याय का मतलब सजा होता है. ऐसी सजा जो अपराधी से ज्‍यादा पीड़ित और उसके घरवाले भोगते हैं.

आज आप जश्न नहीं मना रहे पापा. जश्न मनाना भी नहीं चाहिए, क्योंकि आज खुशी का नहीं मनहूसियत का दिन है. शोक का दिन है. रोने का दिन है.

जब कोर्ट ने आपको बरी किया तो लोगों के बीच फुसफुसाहट शुरू हो गई. सब लोग जोड़-घटाव, गुणा-भाग करने में लग गए. लेकिन मैं उन सबसे कुछ सवाल पूछना चाहूंगी. और चाहूंगी कि उन सवालों का जवाब मुझे मिले. जरूर मिले.

aarushi-650-2_101217072557.jpgमेरे सवालों के जवाब मुझे कौन देगा?

न, न, ये न सोचिएगा कि मैं ये पूछने वाली हूं कि हेमराज और मेरा कातिल कौन है. आखिर उस रात हुआ क्या था. सबको पता है सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई है. तो इस सवाल का जवाब तो खैर किसी से भी नहीं मिलने वाला.

लेकिन मैं जो सवाल पूछने जा रही हूं वो सुन लीजिए-

1- कोर्ट पर कोई क्यों भरोसा करे? इस कोर्ट ने दो लोगों की जिंदगी के 9 साल, उनकी इज्जत, उनका चैन, उनकी मेहनत से कमाए पैसे सबकुछ छीन लिए उनसे. यहां तक कि वो तो अपनी बेटी की मौत का मातम भी नहीं मना सके.

2- 2008 से 2017. इन नौ सालों में जो दर्द, जो अपमान आप दोनों ने सहा है, उसका खामियाजा कौन भरेगा?  

3- आप सीबीआई को दोष देंगे? क्या उनके सिर अपनी काहिली पर खुद ब खुद झुक जाएंगे. आखिर खुद को सही साबित करने के लिए उन्होंने आपनी इज्जत को तार-तार कर दिया. और वो यहीं नहीं रूकेंगे. वो सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे और ये साबित करके रहेंगे कि आप ही दोनों दोषी हो. अपनी बेटी के कातिल हो.

4- क्या पूरा समाज, विचारक, बुद्धिजीवी, सेलिब्रिटी, मेरे नाते-रिश्तेदार, मेरे दोस्त, क्या आप सभी दोषी नहीं हैं, मेरे मां-बाप के दर्द के लिए?

आज पूरे देश के लिए शर्म की बात है. सभी को शर्म से चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए. क्योंकि मैं दुखी हूं. मेरे कत्ल के 9 साल बाद भी मैं दुखी हूं. मैं दुखी हूं क्योंकि इन समाज के ठेकेदारों ने आपको मेरी मौत का शोक भी मनाने नहीं दिया. आपको आंसू बहाने का भी वक्त नहीं दिया.

कानून ने आपका कत्ल कर दिया पापा. सीबीआई ने आपकी जान ले ली. बातें बनाने वाले, चुगलखोर लोगों ने आपके शरीर से आत्मा निकाल ली. आप अब सिर्फ एक चलती-फिरती लाश हैं. आपको हर किसी ने मिलकर सूली पर चढ़ा दिया.

मैं प्रार्थना करूंगी कि अंत आने से पहले इन सभी को अपनी गलती का एहसास हो जाए.

आपकी दुलारी

आरुषि

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कुदरत सहगल कुदरत सहगल @kudrat.sehgal

डिजिटल कंटेंट को लेकर रणनीति बनाती हैं. विचारों से घोर फेमिनिस्ट.

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