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Updated: 25 नवम्बर, 2016 07:44 PM
बबिता पंत
बबिता पंत
  @babita.pant.73
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हर रोज़ की तरह आज सुबह ऑफिस पहुंचकर सबसे पहले अपना लैपटॉप ऑन किया. अगल-बगल बैठे लोगों को हाय-हेलो करके सीट पर बैठी ही थी कि अचानक नजर डेस्क पर रखे टीवी पर चली गई. आंखें झपकाए बिना टीवी देखती रही. थोड़ी देर में आंखों में आंसू थे. लगा बस अब फूट-फूटकर रोने लगूंगी. दिल बुरी तरह घबरा रहा था और हाथ-पैर कांपने लगे. समझ नहीं आया क्या करूं. बगल में बैठे साथी ने पूछा क्या हुआ? मैंने टीवी की ओर इशारा किया और वह बोला, 'हां, सुबह इसी के बारे में घर पर बात चल रही थी.' लेकिन मेरी बेचैनी बढ़ रही थी.

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 क्रेच में केयरटेकर ने बच्ची के साथ दिखाई हैवानियत

दरअसल, मैं टीवी पर चले रहे उस सीसीटीव फुटेज से परेशान थी जिसमें नवी मुंबई के एक क्रेच की केयर टेकर 10 महीने की बच्ची को बुरी तरह पीट रही थी. यही नहीं वह महिला इंसानियत की सारी हदें पार करते हुए उस नन्ही जान को कभी जमीन पर पटकती तो कभी लात मारती. ऐसा नहीं है कि मैंने पहली बार किसी क्रेच का ऐसा सीसीटीवी फुटेज देखा है. हर बार इस तरह के वीडियो देखकर दुख भी होता है और मन गुस्से से भर जाता है, लेकिन इस बार दर्द बहुत अलग था. बिलकुल वैसा दर्द जैसे यह सब किसी और के साथ नहीं बल्कि मेरे साथ ही हुआ है. मैं ऐसा शायद इसलिए महसूस कर रही थी क्येांकि मेरी एक साल की छोटी सी बेटी भी क्रेच जाती है. मैं भी उसे रोज़ सुबह केवल भरोसे और पॉजिटिव वाइब के नाम पर अंजान लोगों के बीच छोड़कर आती हूं.

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वीडियो देखने के बाद तीन घंटे में कम से कम तीन बार मैंने अपनी बेटी के क्रेच में फोन कर डाला. अमूमन मैं दिन में एक बार फोन पर उसका हालचाल पूछती हूं, लेकिन आज मेरा मन कर रहा था कि मैं उसे अभी वहां से जाकर ले आऊं और फिर कभी वहां न भेजूं. मेरी आवाज़ शायद सब कुछ बयां कर रही थी. क्रेच की ओनर ने फोन पर मुझसे पूछा भी कि मैम, सब ठीक है न? आप क्यों इतनी परेशान हैं? आपकी बेटी बिलकुल ठीक है. उसने पराठा खा लिया है और वह अभी सो रही है. थोड़ी देर में उठेगी तो उसे खिचड़ी खि‍लाएंगे. आप परेशान न हों.

उनसे बात करके अच्छा लगा, लेकिन फोन रखने के बाद फिर सोचने लगी कि कहीं उसके साथ भी तो ऐसा सब नहीं हो रहा? वो मासूम तो कुछ बोल भी नहीं सकती. वो मुझे कैसे बताएगी कि उसके साथ वहां क्या होता है? उन लोगों की बातें भी याद आ रही थीं जो मुझसे आए दिन कहते हैं जरूर इसे वो लोग पीटते होंगे, है न? अरे, मां जैसा ध्यान क्रेच की आया थोड़े रखेगी. कैसे इतने छोटे बच्चे को छोड़कर ऑफिस में काम कर लेती हो? ऑफिस जाने की जरूरत ही क्या है? जब बच्चे को पालना ही नहीं था तो पैदा करने की क्या जरूरत थी? बच्चे से बड़ा करियर कैसे हो सकता है? पैसे देकर भला बच्चा पाला जाता है क्या? यह सब सोचकर खुद पर और भी गुस्सा आ रहा था. वैसे मैं बता दूं कि इस तरह के सवाल मेरे घरवालों से लेकर, प्रेस वाली, पार्लर वाली, खाना बनाने वाला, ऑफिस के लोग और यहां तक कि कैब ड्राइवर तक पूछते हैं.

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मैंने कभी ऐसे सवालों के जवाब देना जरूरी नहीं समझा. मैंने कभी कोई सफाई नहीं दी. मैंने हमेशा हंसकर इन सवालों को टाल दिया. बच्ची को क्रेच में डालने का फैसला मेरा था. घरवाले इसके पक्ष में कभी नहीं थे. मैंने कभी किसी के सामने अपने फैसले को सही साबित करने के लिए कोई तर्क भी नहीं दिया. इसका यह मतलब नहीं कि मुझे अपनी बेटी की फिक्र नहीं या मैं उसे बाकि माओं की तरह प्यार नहीं करती. मैं ही नहीं बल्कि दुनिया की कोई भी मां अपने बच्चे को जब किसी और के भरोसे छोड़कर जाती है तो उसे खुशी नहीं होती. सिर्फ वो मां ही जानती है कि उसे कैसा महसूस होता है जब वो अपनी जान को किसी और को सौंपकर जाती है. लेकिन उस मां की हालत तो और ज्यादा खराब होती है जो बिलकुल अंजान लोगों के बीच अपने बच्चे को 9-10 घंटे के लिए छोड़कर रोज़ काम करने जाती है.

अब इस पर लोग कहेंगे कि ऐसी भी क्या मजबूरी है? घर पर रहो और बच्चा संभालो. करियर नहीं भी बनेगा तो क्या हो जाएगा कम से कम बच्चा तो सही सलामत रहेगा. ऐसे लोगों से मैं कुछ नहीं कहना चाहती क्योंकि मैं उन्हें समझा नहीं पाऊंगी बल्कि वे समझ नही पाएंगे. वो नहीं समझ पाएंगे कि एक औरत की ज़िंदगी के मायने सिर्फ घर संभालना ही नहीं बल्कि खुद की भी एक पहचान बनाना है. वो पहचान जो उसे सिर्फ फलां की पत्नी या फलां की मां बनकर हासिल नहीं हो सकती. मैं उन्हें नहीं समझा पाऊंगी कि एक औरत के लिए आर्थ‍िक आज़ादी के क्या मायने हैं.  

खैर, मैं बच्ची को क्रेच जरूर भेजती हूं लेकिन शायद ही कोई ऐसा दिन गया हो जब मैंने क्रेच से लौटने के बाद उसकी गतिविधियों पर ध्यान न दिया हो. मैं उसके खाने से लेकर, कपड़े से लेकर, उसके शरीर पर पड़ी एक छोटी सी खंरोच तक का भी पूरा ध्यान रखती हूं. अगर मुझे कुछ भी अजीब लगता है तो मैं अगले दिन जाकर क्रेच की ओनर से जरूर पूछती हूं कि ऐसा क्यों हुआ? जब उसे लेने जाती हूं तो रोज़ पूछती हूं कि उसने दिन में क्या-क्या किया. कई बार तो मैं बिना बताए दिन के समय अचानक उसके क्रेच में चली गई ये देखने के लिए कि सब ठीक है कि नहीं.

ऐसा नहीं कि मेरी बेटी के क्रेच में कैमरा नहीं है, लेकिन वो लोग लाइव फीड नहीं देते. इस बारे में एडमिशन के वक्त मैंने क्रेच के ओनर से बात की थी कि जब सीसीटीवी कैमरे हैं तो आप फीड क्यों नहीं देते? इस पर उनका जवाब काफी लॉजिकल था. उनका कहना था कि फीड देने पर पेरेंट्स छोटी-छोटी बात को लेकर आ धमकते हैं. जैसे कई बार ऐसा होता है कि किसी एक बच्चे को ज्यादा अटेंशन की जरूरत होती है तो ऐसे में बाकि के पेरेंट्स फीड देख कर कहने लगते हैं कि आप हमारे बच्चे पर ध्यान नहीं देते. मुझे उनकी बात सही लगी. हालांकि क्रेच में इस बात की सुविधा है कि अगर आपको कुछ गड़बड़ लगती है तो आप सीसीटीवी फुटेज आकर देख सकते हैं.

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वैसे इस दिशा में सरकार की तरफ से भी जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए. जिस तरह से विदेशों में इस तरह की व्यवस्था पर कड़ी निगरानी रखी जाती है ठीक वैसा ही हमारे यहां भी जरूरी है. हालांकि इस सबसे अच्छा क्या हो सकता है कि सभी दफ्तरों में जहां महिलाएं काम करती हैं वहां क्रेच का होना अनिवार्य कर दिया जाए. चाहे कोई कुछ भी कहे लेकिन मेरा पुरजोर मानना है कि महिलाओं का घर पर बैठना किसी भी बात का समाधान नहीं हो सकता. आखिर बच्चा सिर्फ मां का नहीं होता. कोई मां अपने बच्चे को संदूक के अंदर बंद करके नहीं रख सकती. बच्चा बड़ा होकर समाज निर्माण में अपना योगदान देता है. ऐसे में यह समाज और सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह बच्चों की सुरक्षा का इंतजाम करे.

हालांकि लिखते-लिखते एक बार फिर बेटी का चेहरा सामने आ गया है और सोच रही हूं कि वो ठीक तो होगी न!

लेखक

बबिता पंत बबिता पंत @babita.pant.73

लेखक आजतक में एसोसिएट एडिटर हैं

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