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सियासत

 |  5-मिनट में पढ़ें  |   08-08-2016

फरवरी में विजय रूपानी को जब गुजरात बीजेपी की कमान सौंपी गई तभी उन्हें आनंदीबेन के उत्ताधिकारी के तौर पर देखा गया था. पाटीदार आंदोलन के जोर के चलते बाद में नितिन पटेल रेस में आगे चलने लगे - लेकिन आखिरकार उन्हें रूपानी के डिप्टी के रूप में संतोष करना पड़ा.

लेकिन ये सब यूं ही नहीं हुआ - खूब तकरार हुई. आखिरकार, शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वीटो का भी इस्तेमाल किया.

क्या मोदी के वीटो के साथ ही इस मामले का पूरी तरह पटाक्षेप हो गया या असल राजनीति की पिक्चर अभी कुछ बाकी है?

हार्दिक, ऊना या शाह की खुन्नस?

प्रधानंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने कई लोगों को तकरीबन खाक से उठाकर फलक पर बिठा दिया. प्रमुख तौर पर इनमें तीन नाम हैं - आनंदीबेन पटेल, स्मृति ईरानी और अमित शाह. स्मृति पहले ही करीब करीब शंटिंग में जा चुकी हैं - और अब आनंदी को भी मेनस्ट्रीम से हटाकर कहीं न कहीं राज्यपाल के तौर पर एडजस्ट कर दिया जाएगा. अगर किसी की बल्ले-बल्ले है तो वो हैं अमित शाह. लेकिन कब तक? क्या इतने अहम फैसलों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोई भूमिका नहीं होती? संभव नहीं लगता.

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दबी जबान में ही सही, सवाल तो उठने ही लगे थे कि कहीं स्मृति और आनंदी के बाद अमित शाह भी तो कतार में नहीं हैं? वैसे भी दिल्ली और बिहार के बाद बीजेपी सिर्फ असम चुनाव जीत पायी है, जिसके नतीजों को लेकर ज्यादार रायशुमारी उसके पक्ष में ही रही. सामने खड़े चुनावों में यूपी और पंजाब ज्यादा अहम हैं. पंजाब में अरविंद केजरीवाल तो यूपी में फिलहाल मायावती की हवा जोरदार है. पंजाब को छोड़ भी दें तो यूपी में बीजेपी को समीकरणों से ज्यादा भरोसा किस्मत पर ही होगा. संघ के भी कई नेता ऐसा ही मान कर चल रहे हैं, जैसी की खबरें आती रही हैं. संघ की ओर से ऐसा एक सर्वे भी आ चुका है.

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तेरा तुझको अर्पण क्या लागे...

खैर, अमित शाह ने गुजरात में गोटियां ऐसे बिठाईं कि आनंदी को सक्रिय राजनीति से रिटायर ही करा दिया. अब आनंदी ही इस बात को बेहतर समझ सकती हैं कि उनकी राजनीति को नेस्तनाबूद करने में सबसे बड़ी भूमिका हार्दिक पटेल की रही, ऊना की घटना ताबूत की आखिरी कील थी, या फिर अमित शाह की पुरानी खुन्नस? मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अमित शाह गुजरात लौटना चाहते थे, मौके बेमौके ऐसी चर्चा बनी रहती है.

मोदी का वो वीटो!

बात तब की है जब जेल से छूटने के बाद शाह के गुजरात जाने पर पाबंदी लगी थी - मोदी ने काफी दूर की सोचते हुए उन्हें यूपी के अखाड़े में भेज दिया. मोदी लहर में राजनाथ से ज्यादा शाह को कामयाबी का क्रेडिट मिला - और उनके बचे कार्यकाल की अध्यक्ष की कुर्सी भी.

उस दिन वेंकैया नायडू मीडिया से मुखातिब थे, गुजरात के नये मुख्यमंत्री की बात उठनी ही थी. पहले तो नायडू ने अमित शाह की तारीफ में खूब कसीदे पढ़े, फिर उनके नाम को ये कह कर खारिज कर दिया कि उनकी दिल्ली में ज्यादा जरूरत है.

बाद तक भी खबरे आती रहीं कि गुजरात के बहुत से विधायक आनंदी के बाद आमित शाह को भी कुर्सी पर देखना चाहते हैं. लेकिन शाह ने उन्हें पूरी तरह निराश नहीं किया - बस, वक्त का फासला थोड़ा बढ़ा दिया.

ऐसा क्यों लगता है? तो क्या गुजरात में फिर मुख्यमंत्री बदलेगा?

नये मुख्यमंत्री को लेकर हुई बीजेपी की बैठक जितनी हंगामेदार होने की समझी जा रही थी, उससे कहीं ज्यादा रही. आनंदीबेन और अमित शाह में जम कर तकरार हुआ.

आनंदीबेन चाहती थीं कि नितिन पटेल को गद्दी सौंपी जाए. अमित शाह चाहते थे कि विजय रूपानी को ये जिम्मेदारी मिले जो सात महीने से स्टेट की कमान संभाले हुए था.

पाटीदार आंदोलन के चलते नितिन पटेल का पलड़ा भारी था - और अमित शाह के कारण विजय रूपानी का.

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आज तक संवाददाता गोपी मनियार की रिपोर्ट के मुताबिक आनंदीबेन को समझाया गया कि नितिन पटेल का पाटीदारों के साथ संवाद ठीक नहीं है. नितिन पटले गुजरात में बीजेपी की फिर से जीत की गारंटी नहीं दे सकते. अभी नोक-झोंक चल ही रही थी कि बीजेपी के संयुक्‍त राष्‍ट्रीय महासचिव वी. स‍तीश फोन मिलाया और आनंदीबेन को थमा दिया. दूसरी तरफ कोई और नहीं प्रधानमंत्री मोदी थे. फिर, आनंदीबेन खामोश हो गईं. शायद, कभी न तोड़ पाने के लिए भी.

फिर भी बीच का रास्ता निकाला गया - विजय रूपानी लीड रोल मिला और नितिन पटेल को सहयोगी की भूमिका दे दी गयी.

आगे क्या होगा...

क्या विजय रूपानी को महज अमित शाह के मजबूत सपोर्ट और साथ में मोदी के हस्तक्षेप के चलते सीएम की कुर्सी मिल गयी? क्या इसमें संघ की भी कोई भूमिका रही होगी? रूपानी की संघ की लंबी पृष्ठभूमि रही है जो निश्चित रूप से मददगार साबित हुई होगी. अगर संघ दूर भी बैठा रहा तो उसके कन्वींस होने में इसकी भूमिका तो रही ही होगी.

आखिर रूपानी को सीएम बनाने के लिए शाह ने इतनी तिकड़म क्यों लगाई कि मोदी से फोन पर बात भी करवा दी? क्या रूपानी इतने दमदार हैं कि बीजेपी को अगला चुनाव जिताने की गारंटी हैं? या कुछ और? क्योंकि तब तक अरविंद केजरीवाल भी मैदान में पूरे दम से डटे हुए होंगे.

विजय रूपानी को शाह इसी बिना पर सीएम बनवाने में कामयाब हुए हैं क्योंकि खुद उन्होंने जीत की गारंटी ली है. यानी, अगर गुजरात चुनाव से पहले शाह को लगा कि रूपानी से ना हो पाएगा, तो वो खुद बैटिंग का फैसला भी कर सकें? लेकिन क्या ये मुमकिन हो पाएगा?

आखिर शाह के कितने करीब हैं रूपानी? क्या इतने करीब कि अगर किसी वक्त शाह उनसे कुर्सी छोड़ने को कहें तो जरा भी देर नहीं लगाएंगे?

सोशल मीडिया शेयर और गुजरात से आ रही खबरों पर गौर करने पर इन सवालों के जवाब 'हां' में मिलते हैं.

तो क्या विजय रूपानी, अमित शाह के लिए वैसे ही हैं जैसे जयललिता के लिए ओ. पनीरसेल्वम या फिर नीतीश कुमार के लिए जीतनराम मांझी?

गुजरते वक्त के साथ गुजरात की कुर्सी पर कुछ वक्त गुजार लेने के बाद रूपानी पनीरसेल्वम को ही आदर्श समझेंगे या मांझी के दिखाए रास्ते पर निकल पड़ेंगे - कुछ दिन तो इंतजार कीजिए.

लेखक

आईचौक आईचौक @ichowk

इंडिया टुडे ग्रुप का ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म.

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