सियासत

 |  4-मिनट में पढ़ें  |   30-12-2016
कुमार विक्रांत
कुमार विक्रांत
  @kumar.v.singh.9
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कांग्रेस पार्टी में सोनिया अब कमान राहुल गांधी को सौंप चुकी हैं. खुद राहुल भी पार्टी के हर अहम मौके पर लीड करते दिख रहे हैं, सोनिया हर जगह नेपथ्य में जा चुकी हैं. अब तो बस महज राहुल की ताजपोशी के औपचारिक ऐलान का इंतजार है. लेकिन सोनिया से राहुल को हो रही जिम्मेदारियों के ट्रान्सफर में गांधी परिवार का एक और शख्स बड़ी भूमिका में आ चुका है, जिसे कांग्रेस के कार्यकर्ता प्यार से पुकारते हैं 'भैय्या जी'.

दरअसल, भैय्या जी कांग्रेस कार्यकर्त्ता प्रियंका गांधी को पुकारते हैं, जबकि नेता आपस में प्रियंका को 'पीजी' निकनेम से बुलाते हैं. अरसे से अमेठी और रायबरेली में सीमित रहने वाली पीजी अब राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हो चलीं हैं. बस परदे के बाहर आना बाकी है, वरना नोटबंदी से लेकर नेताओं की पार्टी में ज्वाइनिंग हो या फिर चुनावों की रणनीति कांग्रेसियों की पीजी अब हर जगह अहम भूमिका में हैं. खुद कांग्रेसी कहते हैं बस उनका किसी पद पर नाम नहीं है और वो खुद सामने नहीं दिखतीं वरना वो सब कर रहीं हैं जो राहुल के अहम सिपहसालार को करना चाहिए.

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प्रियंका गांधी ही हैं 'भैय्या जी' 

हाल में नोटबंदी पर जब राहुल सक्रिय हुए और देश भर में रैली और प्रदर्शन में व्यस्त रहे तो प्रियंका गांधी ही परदे के पीछे कमान संभाले रहीं. वो अहमद पटेल, मल्लिकार्जुन खड़गे , ग़ुलाम नबी आज़ाद और ऑस्कर फर्नान्डीज़ सरीखे नेताओं के साथ बैठकें करके राहुल के लिए रणनीति तैयार करती रहीं. प्रियंका खुद बड़े नेताओं से मिलतीं और फिर बाद में राहुल समेत बड़े नेता बाक़ी नेताओं को ब्रीफ कर देते. हाल में कांग्रेस ने 5 जनवरी को नोटबंदी के खिलाफ देशभर में बड़ा प्रोटेस्ट करने का ऐलान किया, लेकिन जब वो एप्रोव होने प्रियंका के पास गया तो प्रियंका ने उसकी तारीख बदल कर एक दिन आगे बढ़ा दी, क्योंकि 5 तारीख को सिखों का अहम कार्यक्रम था.

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वैसे तो नोटबंदी पर कांग्रेस की बनी कमेटी में चेयरमैन अहमद पटेल और को चेयरमैन ऑस्कर फर्नान्डीज़ हैं. किसी फैसले के जारी होने पर दस्तखत अहमद पटेल के होते हैं, लेकिन उससे पहले फाइनल अप्रूवल प्रियंका ही करती हैं. कहा जा सकता है कि, पार्टी के लिए भाई राहुल सियासत के फील्ड वर्क में जुटे हैं, तो बहन प्रियंका बंद कमरे में पार्टी और भाई के लिए चाणक्य की तरह रणनीति को अंजाम दे रहीं हैं.

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 पार्टी और भाई के लिए चाणक्य बनी हुई हैं प्रियंका

वैसे इससे पहले भी कांग्रेस में गांधी परिवार की जोड़ी यूं ही सक्रिय रही है. नेहरू के दौर में इंदिरा थीं, इंदिरा के दौर में पहले संजय और बाद में राजीव, राजीव के दौर में अरुण नेहरू, सोनिया के दौर में राहुल आ गए और अब राहुल के दौर में प्रियंका कदम बढ़ा रही हैं. वैसे हमेशा सगे रिश्तों की जोड़ी ही गांधी परिवार में रही, लेकिन राजीव गांधी के वक्त थोडा अलग था, जब नजदीकी रिश्तेदार अरुण नेहरू रहे और बाद में अरुण खुद राजीव के खिलाफ हो गए. उन्हीं अरुण नेहरू के खिलाफ 1999 में रायबरेली में प्रियंका ने सतीश शर्मा के लिए चुनाव प्रचार करते हुए कहा था कि, क्या आप लोग उस आदमी को वोट करेंगे, जिसने मेरे पिता की पीठ पर छूरा घोंपा था और अरुण नेहरू चुनाव हार गए थे.

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इस नए प्रयोग से पार्टी को लगता है कि, एक फायदा भी है. जो कांग्रेस के नेता सोनिया के साथ कंफर्ट महसूस करते रहे, लेकिन राहुल के साथ उनकी केमिस्ट्री नहीं बैठ पायी, वो वाया प्रियंका पार्टी में अपनी भूमिका हासिल करके सक्रिय हो रहे हैं, जिसका फायदा ही पार्टी को होगा. लेकिन दो पॉवर सेंटर बनने की सूरत में पार्टी को फायदा होगा या नुकसान, ये तो भविष्य के ही गर्त में है.

आखिर प्रियंका क्यों परदे के बाहर नहीं आ रहीं, इसके पीछे पार्टी के नेताओं का तबका मानता है कि, प्रियंका का करिश्मा राहुल की चमक पर भारी पड़ जायेगा. इसीलिए वो पहले राहुल को पार्टी के नंबर एक नेता के तौर पर स्थापित करना चाहतीं हैं, खुद सिर्फ उनके सहयोगी की भूमिका में रहना चाहती हैं, उसके बाद सही वक़्त आने पर वो खुद खुले आम सक्रिय हो जाएँगी, लेकिन इसका फैसला खुद प्रियंका और गांधी परिवार लेगा.

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कुमार विक्रांत कुमार विक्रांत @kumar.v.singh.9

लेखक आज तक में पत्रकार हैं.

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