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सियासत

 |  4-मिनट में पढ़ें  |   22-12-2016
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सच में भूकंप का कोई भरोसा नहीं. लोग भूकंप का एपिसेंटर मेहसाणा में तलाश रहे थे. तमाम वॉर्निंग और अलर्ट जारी होने के बावजूद लोग बनारस और बहराइच की तरफ भटक रहे थे - और भूकंप चुपके से दिल्ली में आ धमका.

वास्तव में, निजी वजहों से ही सही दिल्ली के उपराज्यपाल पद से नजीब जंग का इस्तीफा तात्कालिक तौर पर तो किसी भी भूकंप से बड़ा झटका देने वाला रहा.

सबका शुक्रिया!

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के वाइस चांसलर रह चुके नजीब जंग ने तीन साल दिल्ली का लेफ्टिनेंट गवर्नर रहने के बाद राजनीतिक को ही एक तरीके से अलविदा कह दिया है. जंग फिर से पढ़ाई-लिखाई की दुनिया एकेडमिक्स की ओर लौटना चाहते हैं.

शीला दीक्षित सरकार के बाद अरविंद केजरीवाल की 49 दिन की सरकार और फिर साल भर के राष्ट्रपति शासन के बाद, दिल्ली में केजरीवाल ने वैलेंटाइन डे को दिल्ली में दूसरी पारी शुरू की. उसके बाद शायद ही कोई दिन बीता हो जब नजीब जंग का टाइटल दूसरे अर्थ में ट्रेंड न किया हो - राजधानी राजनीति का मैदान-ए-जंग न नजर आई हो.

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खैर, नजीब जंग पूरी शिद्दत से अपने काम में लगे हुए थे. दिल्ली की केजरीवाल सरकार की अपनी सियासी मजबूरी भी हो सकती है. केजरीवाल और उनकी टीम द्वारा मोदी सरकार के 'येस-मैन' सहित न जाने कितने तमगों से नवाजे जाने के बावजूद वो अपना काम करते रहे - और जब मामला कोर्ट पहुंचा तो वहां भी उन्हें कोर्ट का सपोर्ट मिला - और मुहर लगी कि दिल्ली में फैसले लेने के लिए फाइनल अथॉरिटी वही हैं, न कि लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार क्योंकि मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में यही दिल्ली का नसीब है.

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इत्ता बड़ा सरप्राइज सरजी!

जाते जाते नजीब जंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ साथ दिल्ली वासियों का भी तहे दिल से शुक्रिया कहा है.

तारीफ पे तारीफ!

मौका था टाइम्स लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन का. नजीब जंग ने बड़ी ही चौंकाने वाली बात कही. केजरीवाल के इल्जामात के ठीक उल्टा, जंग ने बताया कि 99 फीसदी मामलों में वो केजरीवाल सरकार से सहमत होते हैं, सिर्फ 1 प्रतिशत ही मामले ऐसे होते हैं जिनको लेकर उन्हें असहमति होती है. तब जंग ने कहा था, "हमारा व्यक्तिगत तालमेल बहुत अच्छा है. मुझे वो जेंटलमैन लगते हैं. फाइलों पर हमारे बीच बहुत ज्यादा असहमति होने के बाद भी मेरी उनसे कभी बहस नहीं हुई."

जंग की बातें सुन कर दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों के साथ साथ सेशन की मॉडरेटर सीनियर जर्नलिस्ट सागरिका घोष भी हंसी नहीं रोक पाईं.

बस परेशान करते रहे!

जंग की निजी राय भले ही ये रही हो - और केजरीवाल की भी उनके सार्वजनिक बयानों से अलग रही हो लेकिन अब तक तो यही सुनने को मिला कि ये सिर्फ जंग ही रहे जिनकी वजह से केजरीवाल दिल्ली में कोई काम नहीं कर पाते रहे. "वो परेशान करते रहे, हम काम करते रहे."

केजरीवाल का ये स्लोगन टारगेट तो मोदी सरकार को करता रहा लेकिन उसकी जद में पूरी तरह नजीब जंग ही आते रहे. केजरीवाल ने हर दिन यही कहा कि जंग दिल्ली के प्रत्येक प्रोजेक्ट में टांग अड़ा कर उसे पूरा होने नहीं देते. जंग को तो केजरीवाल ने यहां तक कह दिया था कि कुछ भी कर लोग मोदी आपको वाइस प्रेसिडेंट नहीं बनाने वाले क्योंकि वो मुसलमान हैं.

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एक नियुक्ति से खफा केजरीवाल का ट्वीट था, "उप राज्यपाल नजीब जंग हिटलर की तरह व्यवहार कर रहे हैं, पीएम मोदी और अमित शाह के पदचिह्नों पर चल रहे हैं वो प्रधानमंत्री को अपनी आत्मा बेच चुके हैं."

इस्तीफे की खबर आने के बाद केजरीवाल ने जंग से बात की, लेकिन कपिल मिश्रा के ट्वीट से लगता है कि आप नेताओं की आशंकाएं नहीं खत्म हुईं.

बात जहां से शुरू हुई थी, खत्म भी वहीं हुई. क्या केजरीवाल सरकार को अब काम करने का मौका मिलेगा या फिर नई चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा? ज्यादातर सवालों के जवाब वक्त ही देता है. ये सवाल भी कुछ वैसा ही है.

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