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सियासत

 |  3-मिनट में पढ़ें  |   14-02-2017

2002 गुजरात दंगो के दौरान वर्तमान प्रधानमंत्री को तत्कालीन प्रधानमंत्री व युग पुरुष अटल बिहारी बाजपेयी ने नरेंद्र मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी. तब मोदी मुख्यमंत्री थे, आज देश के मुखिया हैं.

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बात 'सबका साथ और सबका विकास' की

चाल व चरित्र मे बहुत फर्क होता है. कहा जाता है कि एक राजा प्रजा का माई-बाप होता है. चुनावों व संसद में बयानबाजी का जो घटिया दौर चल पड़ा है वह वाकई लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है. भाषा के बाद अगर किसी को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है तो वह हैं महिलाएं व मुस्लमान. जिस प्रकार महिलाओं और मुसलमानों को बीजेपी नजरअंदाज कर रही है उससे तो यही लगता है कि राजा का ध्यान कहीं और है.

हक महिलाओं का

पहले बात करते हैं महिलाओं की. बात तो होती है कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिया जाना चाहिए लेकिन धरातल पर यहां उतरता नहीं दिखाई देता है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने केवल 12 फीसदी महिलाओं को ही टिकट दी, महिलाओं के हिस्से में केवल 46 टिकटें आईं. महिलाओं के नाम पर कानून व्यवस्था की बात खूब की जाती है पर टिकट देते वक्त सीधा दरवाजा दिखा दिया जाता है.

जब महिलाओं की राजनीति में भागीदारी ही नहीं होगी तो उनके मुद्दों को कौन सामने लाएगा. हालांकि इस मामले में अन्य पार्टियां भी काफी पीछे हैं कांग्रेस-6, सपा- 25, बसपा- 21 लेकिन क्या देश की मुख्य पार्टी जिसका प्रधानमंत्री देश को नई दिशा में ले जाना चाहता है, को अपना 33 फीसदी का वादा पूरा नहीं करना चाहिए. प्रधानमंत्री कहते हैं यूपी में माताएं बहनें सुरक्षित नहीं, तो क्या दिल्ली में हैं? सरकार माताओं-बहनों के लिए होती है. इसका तो ध्यान आया पर उन्हें टिकट में भी साझेदार बनाया जाए यह ध्यान नहीं आया.

'सबका साथ और सबका विकास' कैसे होगा मुसलमानों का विकास?

मुसलमानो में से तो बीजेपी को उत्तर प्रदेश में कोई प्रत्याशी ही नहीं मिला या फिर यूं कहें कि टिकट देना ही नहीं चाहती है, इस बार किसी भी मुस्लमान को टिकट न देकर बीजेपी ने यह साबित किया कि उसने मुस्लिम तुष्टिकरण को छोड़ा नहीं है. बाकी काम पूरा करने के लिए कुनबे के मंत्री हर वक्त तैयार रहते हैं, जैसा कि रिजिजू ने किया. मुसलमानों के हक और हकूक को उठाने के लिए जब संसद से राज्यों की विधानसभाओं में उनका कोई प्रतिनिधि नहीं होगा तो उनकी आवाज कौन उठाएगा. क्या एक राजा को सभी का ख्याल नहीं रखना चाहिये.

बात मर्यादित भाषा की

बड़े पद वाले की भाषा भी उस पद के मुताबिक होनी चाहिए. हर किसी को बातचीत में सभ्य और मर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए. 'लोकतंत्र में बहस होती है. ऐसी बहसों के दौरान लोग अपने विचार सामने रखते हैं, लेकिन उनकी भाषा आपत्तिजनक नहीं होनी चाहिए.

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गए 'DNA' वाले बयान का जिक्र करना भी जरुरी हैं . जिसके बाद बिहार में मानो एक मुहिम खड़ी हो गई थी. मनुस्मृति के अनुसार राजा को विद्वान, तपस्वी व  न्यायप्रिय होना चाहिए. वह किसी के अधिकारों का हन्ता ना हो, और ना ही किसी वर्ग, समुदाय या सम्प्रदाय के साथ अन्याय करने वाला हो ‘‘सबका साथ और सबका विकास’’ कुछ लोग यह मानते हैं कि मोदी सरकार वोट के सौदे पर नहीं बल्कि विकास के मसौदे पर काम कर रही है और यह न केवल राजधर्म बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य भी है. तो क्या बीजेपी में कोई ऐसा महापुरुष  नहीं रह गया है जो माननीय प्रधानमंत्री जी को इस हकीकत से रूबरू करवाए.

प्रधानमंत्री को अब जरुरत है तो एक वाजपेयी सरीखे नेता की, जो उन्हें लगातार ऊंचाइयों को छूने वाली दिशा का निर्देशन कर सकें. अन्यथा एक राजा और रंक में कोई फर्क नहीं रहा जायगा.

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लेखक

राकेश चंद्र राकेश चंद्र @rakesh.dandriyal.3

लेखक आजतक में सीनियर प्रोड्यूसर हैं

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