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सियासत

 |  4-मिनट में पढ़ें  |   21-04-2017
आलोक रंजन
आलोक रंजन
  @alok.ranjan.92754

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की है. इस मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारे में एक विकल्प की चर्चा शुरू हो गयी है, जो बीजेपी को आने वाले चुनावों में पटखनी दे सके. कुछ दिन पहले ही नीतीश कुमार ने कहा था कि बिहार की तरह राष्ट्रीय स्तर पर भी गैर भाजपा पार्टियों के महागठबंधन को लेकर कांग्रेस पहल करें. क्या ये मुलाकात आने वाले गठबंधन का संकेत तो नहीं? और अगर ऐसा होता है तो क्या 2019 लोकसभा चुनाव में मोदी मुश्किल में पड़ सकते हैं.

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सोनिया गांधी और नीतीश कुमार की मुलाकात के दौरान पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम पर भी चर्चा हुई. इस दौरान इस पर भी बात हुई कि गैर भाजपा दलों को आने वाले चुनाव को ध्यान में रख एक साथ आना चाहिए. बिहार में राजद, जदयू और कांग्रेस की साझा सरकार है. नीतीश कुमार इसी बिहार मॉडल को नेशनल लेवल में अपनाना चाहते हैं. उत्तर प्रदेश में करारी हार के बाद कांग्रेस एक नया फार्मूला तलाश रही हैं ताकि बीजेपी का काट खोजा जा सके. सभी को मालूम हैं की कांग्रेस-सपा गठबंधन के बावजूद बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से विजय हासिल करने में सफलता पायी हैं.

इस मीटिंग में सबसे बड़ी बात ये उभर कर आयी की सभी विपक्षी पार्टियां यानी कि गैर भाजपा पार्टियों को एक रणनीति तैयार करनी चाहिए जिससे वो जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी को कड़ी चुनौती दे सके. अगर विपक्षी खेमे की बात करें तो सोनिया गांधी उन सब में सबसे काबिल लीडर मानी जाती हैं. नीतीश कुमार और सोनिया गांधी में करीब एक घंटा बातचीत हुई जिसमे अन्य चर्चो के अलावा राष्ट्रपति चुनाव को लेकर प्रमुखता से बात हुई और गैर भाजपा पार्टियों के बीच एक सहमति बनाने पर जोर दिया गया. सूत्रों के अनुसार नीतीश कुमार ने इसके लिए पहले से एनसीपी और कई लेफ्ट पार्टियों से बातचीत की हैं और राष्ट्रपति उम्मीदवार को लेकर एक आम सहमति बनाने का प्रयास वो लगातार कर रहे हैं. सूत्रों के अनुसार ये खबर निकल कर आ रही है कि नीतीश कुमार चाहते हैं की सोनिया गांधी सभी पार्टियों के बीच आम सहमति बनाने के लिए अग्रणी रोल आपनाएं.

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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा का गठबंधन मोदी लहर के आगे नहीं टिक पाया था. बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने हार के बाद संकेत दिया था कि भाजपा को हराने के लिए पार्टियों को एकजुट होना होगा. लेकिन उन्होंने हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ा था. मायावती के बाद अखिलेश यादव ने भी बीजेपी को हारने के लिए ग्रैंड अलायन्स की बात कही थी. चाहे अरविन्द केजरीवाल हो या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हो सभी ने कमोवेश ये माना है कि भाजपा को हराने के लिए भाजपा विरोधी पार्टियों को एकजुट होना होगा.

5 राज्यों में हुए विधानसभा नतीजों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता तथा जम्मू एवं कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा था की कि यूपी में भारतीय जनता पार्टी के नाम की सुनामी दिख रही है, और इसे छोटे-से तालाब में उठने वाली लहर न समझा जाए. उन्होंने कहा था कि विपक्षी पार्टियों को वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के बारे में भूलकर वर्ष 2024 के आम चुनाव की तैयारियां शुरू चाहिए. साथ ही उमर अब्दुल्ला ने ये भी कहा था कि विपक्ष को केवल आलोचना करने के बजाय एक सकारात्मक विकल्प के रूप में अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है. साफ है उन्होंने भी गैर भाजपा पार्टियों की अलायन्स बनाने पर जोर दिया है. कश्मीर में हुए लोकसभा उप चुनाव में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस एक गठबंधन में चुनाव लड़ा है.

पिछले कुछ दिनों में राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज रही हैं अरविन्द केजरीवाल और ममता बनर्जी हाल में ही में ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मिले थे. संकेत साफ हैं एक मंच तैयार करने में सभी पार्टियों के लीडर लगे हुए हैं. अब देखना ये है कि इसका ठोस नतीजा कुछ निकल पाता है या नहीं. यहां पर ये बता देना जरुरी है कि बीजेपी ने अपने अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में 2019 लोकसभा चुनाव जीतने का ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है.

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लेखक आज तक में एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर हैं.

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