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सियासत

 |  3-मिनट में पढ़ें  |   11-09-2016

सूरत में भाजपा के रैली में हुए हंगामे के बाद पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली तलब किया है. ऐसी चर्चा है कि पाटीदारों को शांत करने के लिए प्रधान मंत्री आनंदीबेन को विशेष जिम्मेदारी सौंप सकते है . गौरतलब है कि आनंदीबेन पटेल को पाटीदार आंदोलन और दलित अत्याचार के मुद्दे पर अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

सूरत में राजस्व समारोह का आयोजन यह दिखाने के लिए किया गया था कि भाजपा को अब भी पटेल समुदाय का समर्थन प्राप्त है. इस रैली को सफल बनाने में भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी थी. पर हंगामा और हिंसा होने पर अमित शाह एवं अन्य नेताओं को अपना भाषण संक्षेप में ही समाप्त करना पड़ा. जब पटेल समुदाय के युवकों ने रैली में हंगामा किया तो आनंदीबेन भी उस समय मंच पर उपस्थित थीं. ये भी कहा जा रहा है कि समारोह में हंगामे से नाराज भाजपा आलाकमान ने इसकी शिकायत सीधे प्रधानमंत्री मोदी से की. माना यह भी जा रहा है कि सभा में हुए हंगामे के सिलसिले में आनंदीबेन से ही भी जवाब मांगा जाएगा.

गुजरात में बीजेपी के खिलाफ इस तरह का प्रदर्शन सामान्य नहीं है. पर क्या कारण है के राज्य स्तरीय एक राजनितिक सभा में हंगामे के मामले में प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है?

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अमित शाह ने आनंदीबेन पटेल के हटने के बाद एक गैर पटेल विजय रुपानी को मुख्यमंत्री बनवाया. वो ये दिखाना चाहते थे कि उनके ऐसा करने के वावजूद पटेल समुदाय उनके साथ है. इसी लिए इस समारोह का आयोजन किया गया. लेकिन भाजपा अध्यक्ष जो दिखाना चाहते थे उसका ठीक उल्टा हुआ.

हार्दिक, हार्दिक के नारे लगाए जाने लगे और कुर्सियों के साथ तोड़-फोड़ की गई. सन्देश ये गया कि पटेल वाकई पार्टी से काफी नाराज हैं. सबसे पहले सूरत में 8 सितंबर को अमित शाह विरोधी पोस्टर लगाए गए. एक पोस्टर में लिखा था, 'जनरल डायर वापस जाओ'. एक अन्य पोस्टर में कहा गया है कि शाह ने पाटीदार समाज की 'माताओं और बहनों का अपमान किया है.'

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 सूरत रैली का एक दृश्य

पाटीदार आंदोलन समिति के लोग अगस्त 2015 में अहमदाबाद में हुई रैली में लाठीचार्ज करवाने के लिए अमित शाह को दोषी मानते हैं. इस तरह के पोस्टरों को सोशल मीडिया पर भी प्रचारित किया गया. इसका नकारात्मक असर हुआ.

इस रैली में एक लाख लोगों को इकट्ठा करने का लक्ष्य था पर मुश्किल से करीब 15हजार लोग ही आ पाए. इससे गुजरात भाजपा के संगठनात्मक ढांचे की कलई खुल गई, जिसे सबसे मजबूत माना जाता रहा है. ऐसा कहा जाता है कि सूरत रैली स्थल की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा गुजरात के गृहमंत्री रहे अमित शाह ने खुद किया था. रैली में दो आईजी, एक डीआईजी, 6 डीसीपी, 13 एसीपी, 29 इंस्पेक्टर और 70 सब-इंस्पेक्टर समेत 2000 पुलिस वालों को तैनात किया गया था. लेकिन वे लोग पट्टीदार आंदोलनकारियों को पहचानने एवं उनके हंगामा को रोकने में विफल रहे.

मंच को तारों की जाली लगाकर दर्शक दीर्घा से पहले ही अलग रखा गया था ताकि कोई भी चीज फेंकी जाए तो नेताओं के मंच तक नहीं पहुंचे. सारी तैयारियों को धत्ता बताते हुए प्रदशर्नकारियों ने रैली में अफ़रा तफरी मचा दी एवं कार्यक्रम ढंग से पूरा नहीं हो पाया. ये हंगामा न केवल गुजरात भाजपा के संगठन एवं बल्कि प्रदेश सरकार के लिए भी एक बड़ी विफलता के रूप में देखा गया. क्योंकि इस सरकार एवं संगठन को भाजपा अपने आदर्श के रूप में देखती रही है.

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गुजरात मॉडल ने सारे देश के लोगों को इतना प्रभावित किया की उन्होंने मोदी को दिल्ली की बागडोर सौप दी. पर अब, पट्टीदार एवं दलित आंदोलन से हिले हुए उस मॉडल के दरारों की झलक इस रैली में दिखाई दे गई. और जब उस मॉडल की नींव हिलने लगी तो लाजमी था प्रधानमंत्री को उसमे हस्तक्षेप करना पड़ा. अब देखना ये है की प्रधानमंत्री इस मॉडल को बिखरने से बचाने के लिए क्या करते हैं.

लेखक

अशोक उपाध्याय अशोक उपाध्याय @ashok.upadhyay.12

लेखक इंडिया टुडे चैनल में डिप्टी एडिटर हैं.

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