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सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   10-01-2017
कुणाल वर्मा
कुणाल वर्मा
 
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पंजाब विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. यह चुनाव नरेंद्र मोदी और बादलों की प्रतिष्ठा के साथ-साथ कांग्रेस के लिए भी उम्मीदों से भरा है. सबसे ज्यादा मुकाबला पटियाला सीट को लेकर है. यहां से कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह चुनावी मैदान में मौजूद हैं. बीजेपी और अकाली गठबंधन के सामने कैप्टन ही सबसे बड़ी चुनौती के रूप में मौजूद हैं. तमाम ओपीनियन पोल पर भी नजर डालें तो बादलों की चका-चौंध के बीच कैप्टन ही मुख्यमंत्री की पहली पसंद बने हुए हैं. ऐसे में बादलों ने कैप्टन के खिलाफ पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह को उतार कर बड़ा दांव खेला है.

पर जनरल का इस तरह एक विधायक की सीट के लिए चुनाव में उतरना भारतीय सैन्य परंपरा और भारतीय संविधान की प्रतिष्ठा पर आघात है, क्योंकि जनरल जेजे सिंह सेना के सर्वोच्य पद के साथ-साथ राज्यपाल जैसे पद पर भी रह चुके हैं. एक पूर्व राज्यपाल का विधायक स्तर का चुनाव लड़ना न केवल शर्मनाक है, बल्कि मंथन का भी वक्त है. मंथन इस बात पर कि क्या संविधान संशोधन द्वारा राज्यपाल जैसे प्रतिष्ठित पद की गरिमा बनाए रखने के लिए पूर्व राज्यपालों का चुनाव लड़ना प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए?

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 एक पूर्व राज्यपाल अब इलेक्शन में खड़ा है

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह ने एक बड़ा फैसला लेते हुए 71 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखा है. अकाली दल की सदस्यता लेते हुए उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें कहीं. उनमें दमखम बहुत है और भारत मां की सेवा करने का जज्बा भी कूट-कूट कर भरा है. तो क्या उन्हें रिवर्स गेयर लेते हुए एक जवान के रूप में सेना में भर्ती होने का भी हौसला नहीं दिखाना चाहिए? भारतीय सेना के गौरवमयी इतिहास में पद काफी मायने रखता है. इस पद का सम्मान बचाए रखने के लिए एक आर्मी ऑफिसर ताउम्र सजग रहता है. सजग इतना कि अगर किसी री-यूनियन में ये रिटायर्ड अधिकारी मिल जाएं तब भी इनका अनुशासनात्मक रवैया आपको इन्हें सैल्यूट करने पर मजबूर कर देगा. भारतीय सैन्य परंपरा इतनी समृद्ध और अनुशासनात्मक है कि एक पिता भी अपने बेटे को सैल्यूट करने में अपने आपको गौरवान्वित समझता है.

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एक वाकया बताता हूं. साल 2010 के जून महीना का, देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री एकेडमी की पासिंग आउट परेड को मैं कवर कर रहा था, यहां से पासआउट होने के बाद कैडेट को सेना में सीधे कमिशन मिलता है. कहने का मतलब है वह सीधे सैन्य अधिकारी बनता है. परेड के दौरान प्रेस दीर्घा के ठीक बगल में दर्शक दीर्घा की पहली पंक्ति में आर्मी में सुबेदार के पद पर कार्यरत एक सज्जन बैठे थे. जैसे ही परेड उनके सामने से गुजरी वो बगल में बैठी अपनी पत्नी को पकड़ कर रोने लगे. कुछ देर बाद दूसरे मैदान में पिपिंग सेरेमनी के दौरान संयोगवश मैं उनके पास ही था. यकीन मानिए मेरी आंखों में भी आंसू आ गए जब मैंने पिपिंग सेरेमनी के बाद उस सुबेदार पिता को अपने अधिकारी पूत्र को सैल्यूट करते देखा. बाद में उस अधिकारी पूत्र ने अपनी कैप उतारकर पिता के पांव छुए तो पिता ने भी उसे गले लगा लिया. साल में दो बार पासिंग आउट परेड होता है और इस परेड की सलामी के लिए देश के सर्वोच्य पदों पर बैठे लोगों को आमंत्रित किया जाता है.

यह महज संयोग ही था कि उस 2010 के पासिंग आउट परेड के रिव्युइंग ऑफिसर जनरल जेजे सिंह ही थे. सेना से रिटायर्ड होने के बाद जनरल जेजे सिंह को भारत सरकार ने सम्मान देते हुए अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया. राज्यपाल एक ऐसा पद होता है जिसकी गरीमा बेहद महत्वपूर्ण होती है. शायद इसी गरिमा की बदौलत उन्हें उस आईएमए में रिव्यूइंग ऑफिसर बनने का सम्मान प्राप्त हुआ था, जो आईएमए उच्च सैन्य परंपरा और अनुशासन का सदियों से जीता जागता उदाहरण है. जनरल जेजे सिंह का राजनीति में आना उतना अटपटा नहीं है, जितना एक कैप्टन और जनरल का आमने-सामने आना. एक दूसरे का मजाक बनाना. एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना. पंजाब का विधानसभा चुनाव और खासकर पटियाला की राजनीति भारतीय सैन्य परंपरा के साथ एक क्रूर मजाक बनकर रह जाएगी. कैप्टन अमरिंदर तो सालों पहले राजनीति में आ गए थे. पर एक रिटायर्ड जनरल और पूर्व राज्यपाल का इस तरह विधायक जैसे सामान्य चुनाव के लिए मैदान में आए जाना भारतीय राजनीति के लिए बेहद शर्मशार करने वाली घटना है.

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कैप्टन के खिलाफ जनरल को उतार कर बीजेपी और अकाली दल ने भले ही एक राजनीति बिसात बिछाई है. पर इतने प्रतिष्ठित पदों को सुशोभित करने वाले जनरल जेजे सिंह ने अपनी जिंदगी भर की प्रतिष्ठा और सम्मान को दांव पर लगा दिया है. मैं व्यक्तिगत रूप से भी जनरल जेजे सिंह को जानता हूं. उनकी कुछ अनकही और अनसुनी दास्ताओं का गवाह भी रहा हूं. अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहते जब मैंने उनका इंटरव्यू किया था तब मुझे उनके कई नेक और गुमनाम मानवीय हकीकतों का पता चला था. ‘अनटोल्ड स्टोरी ऑफ एक जनरल’ नाम से जब मैंने इंटरव्यू प्रकाशित किया तब देश ने जाना था कि एक कठोर सैन्य अधिकारी के दिल में कितनी मानवता भरी है. जनरल जेजे सिंह ने अपने सैन्य जीवन में कई ऐसे बेहतरीन काम किए जिसकी जितनी मिसाल दी जाए कम है. एक व्यक्ति के तौर पर उन्हें यह पहचान सदियों तक उनकी प्रतिष्ठा में चार चांद लगाता रहेगा. पर पंजाब की राजनीति में मोहरे की तरह इस्तेमाल होकर उन्होंने भारतीय सैन्य परंपरा के साथ-साथ राज्यपाल जैसे अति सम्मानित पद को निराश कर दिया है.

जेजे सिंह ने दम भरा है कि वह पटियाला के चुनाव में इसलिए उतरे हैं क्योंकि उन्हें यहां के लोगों के लिए जमीनी स्तर पर काम करना है. यह एक ऐसी राजनीतिक बयानबाजी है जिसे एक टुच्चा सा गली का नेता भी दोहराता है और प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल कोई बड़ा नेता भी. ऐसे में मंथन का वक्त है कि एक पूर्व सेनाध्यक्ष और एक पूर्व राज्यपाल पंजाब की राजनीति में अचानक से क्यों प्रकट हुआ है. कैप्टन के लिए भी यह किसी शर्मिंदगी से कम नहीं होगा कि जिस सैन्य परंपरा का उन्होंने जिंदगी भर सम्मान किया है उस सैन्य परंपरा और विरासत का क्या होगा. सैन्य परंपराओं का निर्वहन करते हुए उन्हें जिस व्यक्ति को सैल्युट करना चाहिए उसके खिलाफ वह बयानबाजी करने को मजबूर होंगे. चुनाव के परिणाम चाहे जो हों, पर अगर कैप्टन अमरिंदर ने भारतीय सैन्य परंपरा का सम्मान करते हुए जनरल जेजे सिंह के खिलाफ कोई आपत्तीजनक बयानबाजी नहीं की तो व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए वह सबसे बड़े विजेता होंगे. यह सेना की विजय होगी. यह सैन्य परंपरा का सम्मान होगा.

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