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Updated: 18 जून, 2017 01:52 PM
अंशुमान तिवारी
अंशुमान तिवारी
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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के काले धन के खिलाफ युद्ध का सामना करने के लिए एक अनपेक्षित विरोधी सामने खड़ा हो गया है. नोटबंदी के बाद भारतीय बाजार में कैश की किल्लत पहले से ही है. नोटबंदी के बाद से इसके खिलाफ गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) पहली बड़ी नीति होगी.

देश में काला धन के दो मुख्य स्रोत सोना और रियल एस्टेट हैं. जीएसटी के तहत इन दोनों को ही पास कर दिया गया है जबकि वित्तीय निवेश नई कर व्यवस्था के तहत महंगा हो जाएगा. सोना पर सिर्फ 3 फीसदी टैक्स और दवाओं पर 12 फीसदी टैक्स लगाकर जीएसटी ने धनाढ्य लोगों पर लगाम लगाने की कोई कोशिश नहीं की है. वहीं दूसरी ओर रियल एस्टेट को भी जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है.

नकदी अर्थव्यवस्था के होने के कारण भारत में सोना और अचल संपत्ति जैसे भौतिक संपत्तियों के प्रति लोगों का पारंपरिक पूर्वाग्रह होता है. क्रेडिट सुइस ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट 2016 ने पुष्टि की है कि भारत में 86 फीसदी निजी संपत्ति सोने और रियल एस्टेट के रूप में है. जबकि अमेरिका में कुल संपत्ति का करीब 72 फीसदी वित्तीय परिसंपत्तियों का हिस्सा है. वित्तीय संपत्ति में जापान का 53 प्रतिशत और ब्रिटेन का 51 प्रतिशत हिस्सा है.

नोटबंदी का पूरा खेल ही देश में लोगों को कैशलेस सुविधा की ओर झुकाने के साथ-साथ वित्तीय निवेश (बांड, बीमा, शेयर, बैंक जमा) को प्रोत्साहित करना और सोने और जमीन की खरीद को हतोत्साहित करना था. देश के काले धन का बड़ा हिस्सा सोना और रियल एस्टेट क्षेत्र में ही छुपा है. लेकिन अफसोस की बात ये है कि जीएसटी के साथ पारदर्शी निवेश का पूरा आइडिया औंधे मुंह गिर गया है.

Gold GST, Real estateसोना सस्ता नहीं

सोना पर लगाए गए नाममात्र के जीएसटी दर बताते हैं कि कुछ लोग सरकार के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं. पिछले ही साल वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने सोने पर लगाए जाने वाले नाममात्र के टैक्स को देश के धनाढ्य लोगों के लिए सब्सिडी करार दिया था.

सुब्रमण्यन के 2015-16 के आर्थिक सर्वेक्षण में सोना के बारे में कहा गया था: सोना एक मजबूत विकृति है: देश में इसका सबसे ज्यादा उपभोग "अमीर" लोग करते हैं. भारत में, 80 फीसदी सोना केवल 20 फीसदी लोगों तक ही सीमित है. इनमें से भी सोने के प्रमुख खरीददार पूरी आबादी का केवल 2 प्रतिशत लोग हैं. लेकिन फिर भी जीएसटी के पहले सोने के आयात पर लगभग 1-1.6 फीसदी (केंद्र और राज्य दोनों का मिलाकर) टैक्स ही लगाया जाता था. वहीं सामान्य वस्तुओं पर करीब 26 फीसदी टैक्स लगता था.

अपने ही आर्थिक सलाहकार के सलाह को पूरी तरह से अनदेखा करते हुए सरकार ने सोने पर जीएसटी की दर सबसे कम रखी है. पीले धातु के मुकाबले दवाएं, जूते, खाना और मनोरंजन चार से नौ गुना अधिक टैक्स का बोझ झेलेंगे.

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में सोने की मुद्रीकरण योजना शुरू करते हुए लोगों से इस पीले धातु यानी सोने के मोह से मुक्त होने का बिगुल बजाया था. अगर सरकार का मंतव्य सोने की खरीद को हतोत्साहित करना था तो फिर इस पर सबसे ज्यादा जीएसटी टैक्स लगाना चाहिए था. इससे लोगों को सोना खरीदने के बजाए सोने के बॉन्ड में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन मिलता.

अगर जीएसटी का मतलब वित्तीय पारदर्शिता है, तो भूमि और अचल संपत्ति को भी जीएसटी के दायरे में आना चाहिए था. आज देश भर में संपत्ति पंजीकरण और सर्कल दरों को एक कर एक कॉमन नेशनल मार्केट बनाने की बहुत जरुरत है. जमीन और घरों की खरीद-फरोख्त पर डिजिटल निगरानी रखे बगैर अचल संपत्तियों में काले धन की तैनाती को रोकना असंभव है.

हालांकि, राजस्व पाने के लालच में राज्यों ने जीएसटी से अचल संपत्ति को अलग रखने को ही प्राथमिकता दी. और इस कारण ये सेक्टर काला धन के लिए खुला मैदान बना रहेगा. जीएसटी, वित्तीय निवेश को भी प्रोत्साहित नहीं करता है. वित्तीय सेवाओं पर सेवा कर 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत किया जा रहा है. इससे म्यूचुअल फंड मैनेजमेंट और शेयर बाजार में दलाली का चार्ज बढ़ेगा. साथ ही बीमा भी महंगा हो जाएगा.

अब जबकि सेंसिबल और समझदारी भरी नीतियां बनाने का सही समय है, तो सरकार की कथनी और करनी विरोधाभासों से भरी है.

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लेखक

अंशुमान तिवारी अंशुमान तिवारी @1anshumantiwari

लेखक इंडिया टुडे के संपादक हैं.

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